राष्ट्रीय विधायिका सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने शनिवार को कानून बनाने की विधायिका की सर्वोच्चता को बरकरार रखा है। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया में न्यायपालिका की कोई भूमिका नहीं है।
नायडू ने कहा कि संविधान ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है और किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि वे सर्वोच्च हैं और न ही उन्हें अपनी सीमाएं लांघनी चाहिए।
न्यापालिका कानून नहीं बना सकती
कानूनी शक्तियां केवल कानूनी निकायों को ही दी जाती है। कानून, संवैधानिक प्रावधान के अनुसार है या नहीं इसका फैसला कोर्ट को करने दिया जाए। लेकिन कोर्ट कानून नहीं बना सकती है। न्यापालिका कानून नहीं बना सकती है और इसे ध्यान में रखना होगा। न्यायपालिका फैसला करती है, कार्यपालिका लागू करती है और यदि अंत में कोई प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो वह अदालत जा सकता है। न्यायपालिका गतिशील होनी चाहिए।
पूर्व उपराष्ट्रपति ने यह प्रतिक्रिया शक्तियों के संवैधानिक बंटवारे को लेकर उठे विवादों पर दी है।
नायडू ने जताई नाराजगी
नायडू ने विधान सभाओं और संसद में बार-बार होने वाले रूकावटों पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा- 'मैं यह बोलने की कोशिश नहीं कर रहा कि संसद में विरोध, अंतर या असहमति नहीं होनी चाहिए। हालांकि, विरोध, अंतर, प्रदर्शन और सहमति-असहमति ही हमारी लोकतंत्र की विशेषताएं हैं।'
नायडू ने कहा- 'प्रदर्शन हमेशा गरिमापूर्ण और संसदीय मानदंडो के अनुसार होना चाहिए। हमारा व्यवहार एक-दूसरे के लिए इज्जत वाला होना चाहिए और यह व्यवहार बहस और प्रदर्शन के दौरान भी होना चाहिए।'
उपराष्ट्रपति का मानना है कि जनता के प्रतिनिधियों को संसद के बाहर या भीतर कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे देश के लोकतंत्र की गरिमा कम हो।