फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Uttarkashi Avalanche: क्यों बदल रहा है हिमस्खलन का सीजन? पहले जिस मौसम में होती थी बर्फबारी, अब रहता है सूखा

सार

Uttarkashi Avalanche: स्नो एवलांच स्टडी एंड इस्टैब्लिशमेंट के पूर्व निदेशक डॉ. अश्वघोष गंजू कहते हैं कि पहले नवंबर से लेकर अप्रैल के आखिरी और मई की शुरुआत तक जमकर बर्फबारी भी होती थी और मध्य हिमालय की रेंज में एवलॉन्च भी लगभग इतने समय ही होते थे। लेकिन बीते कुछ दिनों में बर्फबारी होने की टाइमिंग नवंबर से बढ़ते हुए धीरे-धीरे जनवरी तक पहुंच गई है...
विज्ञापन
Uttarkashi Avalanche: Representation Image - फोटो : Agency (File Photo)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बीते कुछ सालों में पहाड़ी इलाकों पर हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ गई हैं। खास बात यह है कि इन हिमस्खलन टाइमिंग बीते डेढ़ से दो दशक में बदल गई है। यही वजह है कि हिमस्खलन की घटनाएं वक्त बेवक्त हो रहीं हैं। देश भर के पहाड़ी इलाकों पर होने वाली बर्फबारी और एवलॉन्च पर नजर रखने वाले डीआरडीओ के 'डिफेंस जियोइंफॉर्मेटिक्स रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट' (स्नो एवलॉन्च स्टडी एंड इस्टैब्लिशमेंट) के पूर्व निदेशक अश्वघोष गंजू के मुताबिक बर्फबारी और हिमस्खलन का पूरा सीजन शिफ्ट हो चुका है। यही वजह है कि वक्त बेवक्त पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन हो रहे हैं। इसकी कई वजहों में एक प्रमुख वजह बदलता हुआ मौसम भी है।

जनवरी से लेकर अप्रैल तक बर्फबारी

हिमालयन क्षेत्र में पहाड़ों पर गिरने वाली बर्फ और हिमस्खलन पर शोध करने वाले संस्थान 'स्नो एवलांच स्टडी एंड इस्टैब्लिशमेंट' (अब, डिफेंस जियोइंफॉर्मेटिक्स रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट) के पूर्व निदेशक डॉक्टर अश्वघोष गंजू कहते हैं कि तकरीबन डेढ़ से दो दशक पहले पहाड़ी इलाकों पर स्थित ग्लेशियरों या उन जगहों पर जहां साल भर लगातार बर्फबारी होती थी, वहां एवलांच का सीजन 6 महीने से ज्यादा का हुआ करता था। बहुत ऊंचे दर्जे पर तो साल-साल भर छोटे-मोटे भूस्खलन होते ही रहते थे। लेकिन अब यह ट्रेंड बदल गया है। वह कहते हैं कि पहले नवंबर से लेकर अप्रैल के आखिरी और मई की शुरुआत तक जमकर बर्फबारी भी होती थी और मध्य हिमालय की रेंज में एवलॉन्च भी लगभग इतने समय ही होते थे। लेकिन बीते कुछ दिनों में बर्फबारी होने की टाइमिंग नवंबर से बढ़ते हुए धीरे-धीरे जनवरी तक पहुंच गई है। वह कहते हैं कि अब बर्फबारी जनवरी से लेकर मार्च या अप्रैल तक ही होती है। ऐसे में भूस्खलन की अनिश्चितता भी बढ़ गई है।

विज्ञापन


डॉ. गंजू कहते हैं कि पहाड़ों पर भूस्खलन आने के तीन प्रमुख कारण होते हैं। पहला कारण सबसे ज्यादा ढलान वाले पहाड़ पर बर्फ का अधिक होना होता है। इसके अलावा लगातार गिरने वाली बर्फ और वहां चलने वाली तूफानी हवाओं से भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारक बदलता हुआ मौसम है। वह कहते हैं कि ऐसा देखा गया है कि क्लाइमेट चेंज के चलते पहाड़ों पर न सिर्फ बर्फबारी का ट्रेंड बदला है बल्कि भूस्खलन का भी ट्रेंड बदलने लगा है। पहाड़ों पर चलने वाली हवाओं से लेकर मौसम की नमी और धूप से पर इसका सीधे तौर पर असर पड़ रहा है। यही वजह है कि हिमालय कि उत्तर-पूर्व से लेकर लद्दाख और ग्रेट हिमालयन की पूरी रेंज में हिमस्खलन की घटनाओं में बड़ा बदलाव देखा गया है। ग्रेट हिमालयन रेंज में होने वाली बर्फबारी पर नजर रखने वाले डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन के इस केंद्र में काम करने वाले वैज्ञानिकों की रिसर्च बताती है कि तकरीबन डेढ़ से दो दशक के भीतर बर्फबारी का पूरा ट्रेंड बदल चुका है।

एक दशक पहले निचले इलाकों में हुई थी बर्फबारी

तकरीबन एक दशक पहले हिमालय के निचली सतह वाले इलाकों में जमकर बर्फबारी हुई थी। जिसमें पंजाब के पहाड़ी हिस्से और हिमाचल प्रदेश के शुरू होने वाले कम ऊंचाई वाले ऊना जैसे जिलों में बर्फबारी हुई थी। क्योंकि बहुत कम ऊंचाई वाले पहाड़ी हिस्सों में होने वाली बर्फबारी से वैज्ञानिकों ने चिंता जताई थी और उस पर शोध शुरू हुआ था। चंडीगढ़, मनाली और लद्दाख के चांगला दर्रे की ऑब्जर्वेटरी ने इस पर शोध शुरू किया। इस शोध को करने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक स्नोफॉल का पूरा ट्रेंड बदला हुआ था। उस दौरान हुई रिसर्च में पाया गया कि जो इलाके 18 से 20 हजार फीट पर हैं यानी कि जहां ग्लेशियर हैं, वहां पर बर्फबारी बीते कुछ सालों की तुलना में कम हुई है। जबकि मध्य हिमाचल के इलाकों में जहां पर बर्फ कम पड़ती थी, वहां पर ज्यादा बर्फबारी होने लगी है। इसके अलावा एक नया तथ्य भी सामने आया था कि निचले इलाकों में जहां पर कभी बर्फबारी नहीं हुई वहां पर भी बर्फबारी होने लगी है। इसमें ऊना जैसा कम ऊंचाई वाला हिमाचल प्रदेश का जिला भी शामिल था। वैज्ञानिकों ने उस दौर में भी बदलते हुए मौसम को बड़ा कारण माना था।

जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व वैज्ञानिक एसएन प्रकाश कहते हैं कि जब कम बर्फ वाले बालों पर अचानक बर्फबारी होने लगती है और हवाओं की रफ्तार बदलती है तो एवलॉन्च जैसी स्थितियां बनती है। इसके अलावा लगातार होने वाली बर्फबारी से अधिक ढलान वाले पहाड़ों पर खतरा ज्यादा मंडराता है। प्रकाश कहते हैं कि खासतौर से ग्रेट हिमालयन रीजन में जहां पर बर्फबारी लगातार होती है और अचानक मौसम बदलता है तो यह परिस्थितियां बनती हैं। हालांकि उत्तरकाशी में हाल में हुए बड़ी घटना के दौरान पाया गया कि वहां पर कम तीव्रता का भूकंप भी आया था। चूंकि भूकंप जैसी घटना के बाद एक बड़ी हलचल होती है और एवलॉन्च जैसी परिस्थितियां पैदा होती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें