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दिल्ली के भरोसे चलने वाले त्रिवेंद्र रावत को कुर्सी के नीचे से जमीन खिसकने का नहीं रहा एहसास

Tue, 09 Mar 2021 10:29 PM IST
गौरव पाण्डेय शशिधर पाठक, नई दिल्ली

सार

  • मुख्यमंत्री पद मिलने के बाद से थे काफी निश्चिंत
  • पीएम, एचएम, यूपीसीएम, एनएसए, सीडीएस और संघ का रखते थे ख्याल
  • अपने ही मंत्रियों और विधायकों की नाराजगी भांपने में चूके
  • चार मंत्रियों और 18 विधायकों की चिंता को आलाकमान ने दी तरजीह
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राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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उत्तराखंड गठन के बाद मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के बाद कोई भी मुख्यमंत्री ठीक ढंग से कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। केंद्र के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री पद की रेस में दिवंगत भाजपा नेता प्रकाश पंत को पछाड़ने के बाद त्रिवेंद्र रावत बिल्कुल निश्चिंत हो चले थे। दिल्ली का उन पर इतना भरोसा था कि उन्हें देहरादून में अपनी जमीन खिसक जाने का एहसास ही नहीं हुआ। सबसे खास बात है कि यह जमीन भी उनके अपने पहले के दो चहेते मित्र मंत्रियों ने ही खिसकाई।

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सूत्र बताते हैं कि त्रिवेंद्र रावत की शिकायत राज्यपाल बेबी रानी मौर्य भी भाजपा नेताओं से करती हैं। मुख्यमंत्री से उनके समीकरण ठीक नहीं थे। वह विधायकों, पार्टी के कार्यकर्ताओं, संघ और इसके अनुषांगिक संगठनों के मझोले और छोटे नेताओं की समस्या पर बहुत ध्यान नहीं दे पाते थे। हालांकि उनके निकटस्थ उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत इन सभी मामलों में काफी सक्रिय रहे हैं। धन सिंह रावत संघ पृष्ठभूमि से जुड़े जमीनी नेता हैं। उन्होंने सरकार के कामकाज और संघ की विचारधारा से गजब का तालमेल बना रखा है। उत्तराखंड अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से लेकर युवा मोर्चा तक में उनकी छवि ठीक-ठाक है।

ढीले-ढाले तरीके से चला रहे थे राजकाज

उत्तराखंड भारतीय जनता पार्टी के कुमाऊं क्षेत्र के एक विधायक का कहना है कि मुख्यमंत्री निजी तौर पर ठीक थे, लेकिन उनका कामकाज का तरीका ढीला ढाला था। राज्य में नौकरशाह ज्यादा हावी हो गए थे। सूत्र का कहना है कि आखिर कुछ तो वजह होगी कि कैबिनेट के कुछ मंत्री भी खुश नहीं थे। सूत्र का कहना है कि राज्य के प्रभारी दुष्यंत गौतम और पर्यवेक्षक रमन सिंह के सामने भी पार्टी के नेताओं ने अपनी नाराजगी रखी थी। बताते हैं गैरसैण को कमिश्नरी घोषित किए जाने के बाद लोगों में नाराजगी कुछ ज्यादा बढ़ गई थी। एक अन्य विधायक के अनुसार राज्य सरकार में मंत्री अरविंद पांडे, सुबोध उनियाल समेत कई नेताओं को राज्य सरकार के कामकाज की जनता में बनी छवि परेशान कर रही थी।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी भी हो गए थे नाराज

भाजपा के संस्थापक नेताओं में एक डॉ. मुरली मनोहर जोशी भी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कामकाज के तरीके से बहुत खुश नहीं थे। गैरसैण को कमिश्नरी घोषित करने पर भी उन्होंने अपनी नाराजगी जताई थी। बताते हैं कि जोशी उत्तराखंड में तमाम गतिविधियों पर नजर रखते हैं। उनसे उत्तराखंड के तमाम नेता मिलने आते रहते हैं। गैरसैण को कमिश्नरी घोषित करने की सूचना भी जोशी के पास त्रिवेंद्र रावत की शिकायत के साथ आई थी। हरिद्वार में कुंभ का आयोजन जिस तरह से किया जा रहा है, इसे लेकर साधु-संत समाज में भी रावत को लेकर नाराजगी थी। इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके अनुषांगिक संगठनों की तरफ से भी काफी शिकायतें थीं।

अगले साल चुनाव और जनता में नाराजगी

उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। वहीं राज्य में जनता के बीच में चार साल की सरकार के कामकाज की छवि अच्छी नहीं है। भाजपा के विधायकों को भी लग रहा है कि यही स्थिति बनी रही तो चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा। पार्टी सूत्रों का कहना है कि मंत्रियों और विधायकों तथा पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अपनी इसी चिंता से केंद्रीय नेतृत्व को अवगत कराया। इसके बाद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने त्रिवेंद्र रावत को तलब करके पार्टी का फैसला सुनाया।

दिल्ली और शीर्ष नेताओं को छोड़कर अन्य की परवाह नहीं थी

कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि जो गलती पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपने समय में कर रहे थे, कुछ उसी तरह की स्थिति त्रिवेंद्र रावत की थी। सूत्र का कहना है कि त्रिवेंद्र रावत केंद्र सरकार और भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ समीकरण बनाकर चल रहे थे। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का आर्शीवाद प्राप्त था। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनकी नजदीकी किसी से छिपी नहीं है। 

सीडीएस जनरल बिपिन रावत से लेकर अन्य से उनके रिश्ते ठीक रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर हालत चिराग तले अंधेरा की रही। इस बारे में विधायक संजय गुप्ता, भरत सिंह चौधरी समेत अन्य कुछ नहीं कहना चाहते। भाजपा सांसद अजय भट्ट, अजय टमटा, तीरथ सिंह रावत सभी को 10 मार्च की दोपहर बजे विधायक दल की बैठक का इंतजार है। देखना है कि भाजपा के विधायक दिल्ली से देहरादून तक सामंजस्य बिठाने वाले किस चेहरे को चुनते हैं।
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धन सिंह रावत, अजय भट्ट या फिर निशंक

देहरादून में शाम पांच बजे तक चर्चा में मुख्यमंत्री के तौर पर धन सिंह रावत का नाम सबसे आगे चल रहा था। लेकिन अन्य चेहरे में अजय भट्ट, और केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक अनुभवी नेता के तौर पर जगह बनाए हैं। भाजपा के एक खेमे को अजय भट्ट की तरह किसी ब्राह्मण चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने की उम्मीद दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री न बना तो कुमाऊं का चेहरा उप मुख्यमंत्री जरूर बन सकता है। इसके लिए पुष्कर सिंह धामी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। राज्य विधानसभा के चुनाव में अभी एक साल से कम समय बचा है। केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का भी नाम लिया जा रहा है। चर्चा में सतपाल महाराज का भी नाम है।
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