वहीं, दूसरी तरफ राज्य के सभी बड़े कांग्रेस नेता सभी कांग्रेस उम्मीदवारों के लगातार संपर्क में हैं। पार्टी परिणाम आने तक सभी को साध कर रख रही है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता हरीश रावत मोर्चा संभाले हुए हैं। वे लगातार उम्मीदवारों के साथ-साथ आलाकमान से भी संपर्क में बने हुए हैं। जल्द ही वे भी कांग्रेस के पदाधिकारियों के साथ अहम बैठक कर आगे की रणनीति तय करेंगे।
निर्दलीय विधायकों की भूमिका होगी अहम
राज्य के चुनाव परिणाम 10 मार्च को घोषित किए जाएंगे। लेकिन दोनों ही दल अपनी-अपनी सरकार बनाने का दावा पेश करते हुए नजर आ रहे हैं। जहां सत्ताधारी भाजपा का दावा है कि वह साठ सीटें जीत रही हैं, जबकि कांग्रेस का दावा है कि वह 48 से ज्यादा सीटें जीत रही है और सरकार बना रही है। राजनीतिक जानकार इस बात की भी आशंका जता रहे हैं कि राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बन सकती है। ऐसे में बसपा, उत्तराखंड क्रांति दल, आम आदमी पार्टी के जीतने वाले विधायकों की भूमिका अहम हो जाएगी।
2017 के मुकाबले कम हुए मतदान के मायने
उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों पर 14 फरवरी को एक ही चरण में मतदान हुआ था। राज्य में इस बार कुल 62.5 फीसदी मतदान हुआ है, जो कि पिछली बार के कुल मतदान प्रतिशत से कम है। 2017 विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड के 70 विधानसभा सीटों पर 65 फ़ीसदी मतदान हुआ था, जिसमें भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज्यादा 58 सीटों पर जीत मिलीं थीं। पांच साल के कार्यकाल के दौरान उत्तराखंड को तीन मुख्यमंत्री मिले।
उत्तराखंड में अब तक चार विधानसभा चुनाव हुए हैं। इनमें दो बार भारतीय जनता पार्टी और दो बार कांग्रेस को सत्ता मिली है। लेकिन इस बार समीकरण थोड़े बदले हुए नजर आ रहे हैं। जहां भाजपा वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के द्वारा कराए गए विकास कार्यों को देखते हुए सत्ता में वापसी की उम्मीद लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के चुनाव में उतरने से भाजपा और कांग्रेस को नुकसान भी हो रहा है।