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उत्तर प्रदेश: चार साल में दो दर्जन साधुओं की हत्या या संदिग्ध मौत, स्वामी जितेंद्रानंद ने कही बड़ी बात

Tue, 21 Sep 2021 05:38 PM IST
सुरेंद्र जोशी अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

लगातार हत्या या संदिग्ध मौतों से साधुओं के बीच चिंता पैदा हो गई है। संत समाज यूपी की योगी सरकार से अपनी सुरक्षा की गुहार लगा रहा है।
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prayagraj news : गुरु पूर्णिमा पर बाघंबरी गद्दी मठ में महंत नरेंद्र गिरि की पूजा करते भक्त। - फोटो : prayagraj
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विस्तार
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अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत से पूरा देश सन्न रह गया है। संत समाज अब घटना का जल्द से जल्द पूरा सच जानना चाहता है। इसके लिए उच्चस्तरीय जांच की जा रही है। उत्तर प्रदेश में किसी साधु-महंत की असमय मौत का  यह पहला मामला नहीं है। पिछले चार वर्ष में प्रदेश में दो दर्जन से ज्यादा बड़े साधुओं की हत्या या संदिग्ध मौत हो चुकी हैं। ज्यादातर मौतों  के पीछे का रहस्य अब तक सामने नहीं आया है।

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'कंचन और कामिनी से दूर रहें संत'
उधर, अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद जी महाराज ने अमर उजाला से चर्चा में संतों से अपील की कि वे  'कंचन और कामिनी' के प्रभाव से दूर रहें। धन और माया से यथासंभव दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए। क्या पिछले कुछ समय में संतों पर होने वाले हमलों में वृद्धि हुई है? अमर उजाला के इस सवाल पर स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि पिछले 50 वर्ष के आंकड़ों पर दृष्टि डालने पर यह समझ में आता है कि संतों के ऊपर इसी प्रकार के हमले होते रहे हैं। इसके पूर्व इस तरह की घटना घटने पर चर्चा भी नहीं होती थी। आज यह विशेष चर्चा का कारण केवल इसलिए बन पाया है क्योंकि प्रदेश में एक योगी की सरकार है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार को संतों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
भाजपा ने हिंदू व सनातन की परिभाषा कमजोर की : प्रमोद कृष्णम
कल्कि पीठाधीश्वर और कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि यह राजनीति का विषय नहीं है। उत्तर प्रदेश में दर्जनों साधुओं की हत्याएं हो चुकी हैं। प्रदेश सरकार को इस बात की जांच करनी चाहिए कि संतों के ऊपर लगातार हो रहे हमलों के क्या कारण हैं और इन्हें कैसे रोका जा सकता है। आचार्य प्रमोद कृष्णम कहते हैं कि भाजपा ने हिंदू और सनातन की परिभाषा को कमजोर किया है। उनके लिए जो भाजपा से जुड़ा होता है, वही हिंदू है और जो इनसे जुड़ा नहीं है, उसे हिंदू नहीं माना जा रहा है। भाजपा ने सनातन धर्म को सत्ता पाने का हथियार बना लिया है। यह सोच हिंदू धर्म को संकुचित कर रहा है। इस तरह की सोच से बाहर निकला जाना चाहिए।
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हिंदू समाज से कटने की कीमत चुका रहे हैं संत : यति नरहिंसानंद
गाजियाबाद के डासना मंदिर के पुजारी स्वामी यति नरसिंहानंद सरस्वती पर भी कई बार हमला हो चुका है। चंद दिनों पहले उनके डासना स्थित देवी मंदिर में भी एक साधु की जान लेने की कोशिश की जा चुकी है। स्वामी यति नरसिंहानंद सरस्वती ने कहा कि पहले संत समाज हिंदू धर्म की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहते थे। वे समाज के हर सुख-दुख में उनके साथ खड़े रहते थे। इससे समाज में संतों की अत्यधिक प्रतिष्ठा होती थी। लेकिन बदले समय में संत समुदाय सामान्य लोगों से दूर होता जा रहा है। उसका लोगों के साथ संपर्क कटता जा रहा है। कुछ संत धन-संपत्ति के चक्कर में भी पड़ गए हैं।



आखिर क्यों हो रही हैं साधुओं की हत्याएं
साधुओं की हत्याओं के पीछे संपत्ति विवाद एक बड़ा कारण बनकर सामने आया है। मंदिरों में आ रहे चढ़ावे के कारण अनेकों मंदिरों के पास काफी संपत्ति होती है। इसको लेकर साधुओं में आपसी वैमनस्य भी बढ़ जाता है जो कई बार हत्याओं की वजह बनता है। महंत नरेंद्र गिरी ने भी अपनी मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व करोड़ों रूपये की भूमि का सौदा किया था। इसी प्रकार संत अनेक मामलों में बड़े लेनदेन करते हैं जिससे वे अक्सर अपराधियों के निशाने पर आ जाते हैं।
मंदिरों के पास काफी भूमि होती है। कई बार भूमाफिया इस पर कब्जा करना चाहते हैं। इसका विरोध करने पर संतों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। अयोध्या, गोरखपुर, मेरठ और सुल्तानपुर में कई संतों की हत्याओं के पीछे इसी तरह के कारण सामने आए थे।
नशाखोरी भी संतों की हत्या के पीछे एक बड़ी वजह बनकर सामने आया है। ज्यादातर संत अपनी नशे की पूर्ति के लिए गांजे का सेवन करते हैं। इनके पास गांजे की आसान उपलब्धि को देखकर ज्यादातर अपराधी इनके पास आकर नशे का सेवन करते हैं। लेकिन अपराधियों की प्रवृत्तियों से तंग आकर जब संत इन्हें अपने से दूर करने की कोशिश करते हैं, या उन्हें नशा उपलब्ध कराने से इनकार कर देते हैं, तब इन्हीं अपराधियों के द्वारा इन साधुओं पर हमला कर दिया जाता है। इस तरह की अनेक घटनाएं पुलिस के सामने आ चुकी हैं।
एक नज़र कुछ साधुओं की हत्या की घटनाओं पर
11 अक्टूबर 2020 को गोंडा में रामजानकी मंदिर के पुजारी बाबा सम्राट दास की हत्या कर दी गई थी। आरोप है कि मंदिर की भूसंपत्ति पर कब्जा करने के लिए स्थानीय भूमाफियाओं ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी।
29 जून 2021 को मेरठ के थाना मुंडाली के बढ़ला गांव में एक साधु चंद्रपाल की ईंट से कुचलकर हत्या कर दी गई थी। वे गांव के ही एक मंदिर में रहते थे। कथित तौर पर मृत्यु से पूर्व मंदिर के पास ही उनसे मारपीट की गई थी और मारकर उनका शव मंदिर के पास फेंक दिया गया था।
यूपी कांग्रेस ने जारी की थी 20 साधुओं की हत्या की सूची
यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने अक्तूबर 2020 में एक सूची जारी कर दावा किया था कि पिछले तीन सालों में 20 से ज्यादा साधुओं की हत्या कर दी गई है। इसके लिए उन्होंने प्रदेश सरकार पर आरोप लगाते हुए संत समुदाय की सुरक्षा की मांग की थी। यूपी कांग्रेस ने साधुओं की हत्याओं की जो लिस्ट मीडिया में जारी की थी, वह इस प्रकार है-
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5 अक्टूबर 2020- मथुरा में एक साधु की हत्या।
14 सितंबर 2020- मेरठ में कांतिप्रसाद नाम के साधु की हत्या।
11 सितंबर 2020- बिजनौर में साधु की हत्या।
6 सितंबर 2020- कन्नौज के साधु शीलीग्राम की हत्या।
23 जुलाई 2020- सुल्तानपुर में एक साधु की हत्या।
18 जुलाई 2020- पीलीभीत मेंं बाबा लालगिरी की हत्या।
25 अप्रैल 2020- गोरखपुर में एक पुजारी की हत्या।
26 फरवरी 2020- पीलीभीत में एक पुजारी की हत्या।
25 फरवरी 2020- पीलीभीत में एक महंत की हत्या।
18 जनवरी 2020- चित्रकूट के महंत अर्जुनदास की हत्या।
28 अक्टूबर 2019- मुरादाबाद में एक साधु की हत्या।
23 सितंबर 2019- हापुड़ में साधु बालक दास की हत्या।
1 सितंबर 2019- हरदोई में साधु हीरादास की हत्या।
14 जून 2019- मथुरा में एक साधु की हत्या।
2जून 2019- रायबरेली में पुजारी स्वामी प्रेमदास की हत्या।
31 अगस्त 2018- बाराबंकी के पुजारी बाबा शमशेर सिंह की हत्या।
31 अगस्त 2018- पीलीभीत में पुजारी रामेश्वर दयाल की हत्या।
19 अगस्त 2018- मेरठ में एक पुजारी और उनके सेवादार की हत्या।
14 अगस्त 2018- औरैया में दो साधुओं के साथ-साथ एक अन्य व्यक्ति की भी हत्या।
13 अगस्त 2018- सुल्तानपुर के पुजारी श्यामलाल की हत्या।

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