स्वामी प्रसाद मौर्य अखिलेश यादव से मिले
- फोटो : अखिलेश के ट्विटर अकाउंट से
आखिरकार स्वामी प्रसाद मौर्य ने योगी मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है। उनके साथ ही विधायक रोशनलाल, बृजेश प्रजापति, भगवती सागर भी सपा की सदस्यता लेंगे। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तत्काल बाद हुए इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम ने जहां भाजपा की चिंता बढ़ाई है, वहीं सपा धारणा की सियासी लड़ाई में अचानक मजबूत दिखने लगी है।
दरअसल बीते चुनाव में भाजपा ने बड़ी संख्या में दलबदलुओं पर भरोसा जताया था। चुनाव से ठीक पहले पाला बदलने वाले करीब सौ नेताओं को टिकट दिया था। अब यही बाहरी नेता पार्टी के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं। मौर्य ने ऐसे समय में पाला बदला है, जब भाजपा के शीर्ष नेता शुरुआती तीन चरण के उम्मीदवारों पर मैराथन मंथन में जुटी थी।
पार्टी को डर है कि अगर पालाबदल का सिलसिला तेज हुआ तो हालात संभालने में समस्या आएगी। दरअसल सपा प्रमुख अखिलेश यादव को पता है कि पार्टी के लिए मुसलमान-यादव वोट बैंक अब सत्ता की चाबी नहीं रहा। लोकसभा के बीते दो और विधानसभा के एक चुनाव में करारी हार ने अखिलेश को इसका अहसास करा दिया।
इसी के मद्देनजर अखिलेश यादव ने इस चुनाव में भाजपा के पुराने फार्मूले की तर्ज पर नई सोशल इंजीनियरिंग की। इस नई सोशल इंजीनियरिंग में उन्होंने उसी बिरादरी पर ध्यान केंद्रित किया, जिसने भाजपा को बीते विधानसभा चुनावी में तीन चौथाई बहुमत दिलाई। दिलचस्प तथ्य यह है कि तब बाहर से आए नेताओंं ने ही भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग को मजबूती दी थी।
ये है सियासत : स्वामी प्रसाद का जाना बड़ा झटका
राजनीति में धारणा सबसे महत्वपूर्ण है। ठीक चुनाव के समय मौर्य के पाला बदलने से भाजपा के कमजोर पड़ने की धारणा बन सकती है। अगर भविष्य में थोक के भाव में पाला बदल हुआ तो यह धारणा उतनी ही तेजी से मजबूत होगी। वैसे भी मौर्य की मौर्या, शाक्य, सैनी और कुशवाहा बिरादरी में मजबूत पैठ है। इनका राज्य के 13 जिलों में बड़ा प्रभाव है, जहां इनकी उपस्थिति करीब 15 फीसदी है। बीते चुनाव में इस बिरादरी के स्वामी प्रसाद सहित कुछ अन्य नेताओं को साध कर भाजपा ने इस बिरादरी के करीब 90 फीसदी वोट हासिल किए थे।