आईएस और अल कायदा ने पूरी दुनिया में फैलाया जाल
रिटायर्ड आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना, जो केरल के डीजीपी और सीआरपीएफ व बीएसएफ में बतौर एडीजी अपनी सेवाएं देने के साथ-साथ 46 किताबें एवं 76 से अधिक रिसर्च पेपर लिख चुके हैं, उनका कहना है कि सीआईए अभी अनुमान लगा रही है। हार्ड इंटेलिजेंस इनपुट का अभाव है। वह भी उस आतंकी संगठन के मामले में, जो अमेरिका को सबसे बड़ी चोट 9/11 पहुंचा चुका है। अल-कायदा के कई सदस्यों के बारे में अभी तक कुछ नहीं पता है। अमेरिकी फौज के हथियार, गोला बारूद, संचार उपकरण और गाड़ियां, अफगानिस्तान में मौजूद हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री खुद यह बात कह चुके हैं कि तालिबान के पास हमारे बहुत से हथियार हैं।
डॉ. अस्थाना बताते हैं, जब अमेरिका को अफगानिस्तान से वापस लौटना था तो हथियारों और दूसरे आतंकी संगठनों को पुख्ता तरीके से खत्म करने की योजना बनानी थी। महाशक्ति से यहीं पर चूक हो गई है। तालिबान और उसके सहयोगी आतंकी संगठनों के पास हथियारों की तंगी कभी नहीं रही। गोला-बारूद भी कम नहीं था। ये सब कहां से सप्लाई हो रहा था। अमेरिका उसे क्यों नहीं पकड़ पाया। लादेन मारा गया, अल-कायदा की कमर तोड़ दी, अब उसके संगठन को दोबारा से उठने में दो साल लगेंगे, ये सब जनता को भरोसा दिलाने के लिए तो ठीक है, लेकिन 'सीआईए' जैसी इंटेलिजेंस की जवाबदेही इससे तय नहीं होती। अल-कायदा को लेकर उसे पर्याप्त सबूत जुटाने होंगे।
दुनिया के कई देशों में इस बात की चर्चा होती रही है कि 9/11 के हमलों के बाद लादेन को मारने से लेकर अफगानिस्तान में 20 साल रहने के बाद अमेरिका को क्या हासिल हुआ है। क्या आतंकवाद पूरी तरह खत्म हो गया। 'सीआईए' ने अगस्त 2001 में राष्ट्रपति बुश को बताया था कि अल-कायदा बड़ा हमला कर सकता है। हमले को रोका नहीं जा सका। वजह, उस वक्त अल-कायदा ने, साइबर मामलों में खासी महारत हासिल कर ली थी। आज आईएस और अल कायदा, ये संगठन सोशल मीडिया नेटवर्किंग के जरिए अफगानिस्तान से बाहर जा चुके हैं। इन्होंने पाकिस्तान के अलावा भारत, दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व एशिया और अफ्रीका सहित कई देशों में जाल फैला दिया है।
भारत में एनआईए ऐसे कई मामलों का खुलासा कर चुकी है, जिसमें मुस्लिम समुदाय के युवा 'आईएस' के सदस्य बने हैं। डॉ. एनसी अस्थाना कहते हैं, अल-कायदा को खत्म करने के लिए अमेरिका को जो करना चाहिए था, वह नहीं हो सका। कुछ खामियां रह गई हैं। नतीजा, आज चरमपंथी गुट दोबारा से फन उठाने का प्रयास कर रहे हैं। सीआईए को ठोस सबूत जुटाने होंगे। 9/11 हमले के बाद सीआईए के पास ऐसे ठोस सबूत नहीं थे कि जिससे यह साबित हो सके कि हमला अल-कायदा ने ही किया है। घटनास्थल से मोहम्मद अत्ता का पासपोर्ट मिलना, ये बहुत विश्वसनीय बात नहीं थी। उसे हमलों का मुख्य अभियुक्त बनाया गया था। सीआईए को वह सब जानकारी जुटानी होगी, जिसके बल पर आतंकी संगठन यह सोच रखते हैं कि इस्लाम के दुश्मनों यानी पश्चिमी देशों पर हमला करना असंभव नहीं है, उसे मुश्किल कहा जा सकता है। सीआईए के डिप्टी डायरेक्टर डेविड कोहेन और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का बयान कुछ ऐसा ही इशारा करता है कि अल-कायदा दोबारा से अफगानिस्तान की जमीन से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के खिलाफ हमला करने की हिम्मत जुटा सकता है।