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दोबारा फन उठा रहा है 'अल-कायदा': अफगानिस्तान में इस आतंकवादी नेटवर्क को लेकर संदिग्ध है 'सीआईए' की क्षमता

सार

अफगानिस्तान के मामले पर लगातार नजर रख रहे पूर्व आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना कहते हैं, अफगानिस्तान में इस आतंकवादी नेटवर्क को लेकर 'सीआईए' की क्षमता संदिग्ध है। जनता को आश्वस्त करने के लिए तो यह दावा ठीक है, लेकिन 'अल-कायदा' और 'आईएस' जैसे आतंकी संगठनों की ग्राउंड पोजिशन जांचने की जब बारी आती है तो 'सीआईए' के पास पुख्ता इंटेलिजेंस इनपुट का अभाव दिखता है...
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अल कायदा प्रमुख अयमान अल-जवाहिरी और सीआईए - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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अल-कायदा, वही खूंखार आतंकवादी संगठन है, जिसने अमेरिका में 9/11 को हमला कर दुनियाभर में हड़कंप मचा दिया था। अस्सी के दशक में पेशावर (पाकिस्तान) में ओसामा बिन लादेन ने जिस 'अल-कायदा' की नींव रखी थी, आज वह फिर से चर्चा में है। अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने के बाद यह आतंकी संगठन क्या दोबारा से फन उठा रहा है, अमेरिकी प्रशासन और उसकी इंटेलिजेंस एजेंसी 'सीआईए' के पास इस बाबत भरोसे वाले इनपुट का अभाव है। सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के उप निदेशक डेविड कोहेन ने कहा है, अफगानिस्तान में अल-कायदा की संभावित गतिविधियों के कुछ संकेत दिखने लगे हैं। अभी शुरुआती दिन हैं, हम स्पष्ट रूप से उस पर बहुत कड़ी नजर रखेंगे।

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विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन कहते हैं, अफगानिस्तान से हमला करने की अल-कायदा की क्षमता अत्यधिक निम्न स्तर की है। वर्तमान में इसका मूल्यांकन करें तो उसके पास वह क्षमता है ही नहीं। अफगानिस्तान के मामले पर लगातार नजर रख रहे पूर्व आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना कहते हैं, अफगानिस्तान में इस आतंकवादी नेटवर्क को लेकर 'सीआईए' की क्षमता संदिग्ध है। जनता को आश्वस्त करने के लिए तो यह दावा ठीक है, लेकिन 'अल-कायदा' और 'आईएस' जैसे आतंकी संगठनों की ग्राउंड पोजिशन जांचने की जब बारी आती है तो 'सीआईए' के पास पुख्ता इंटेलिजेंस इनपुट का अभाव दिखता है। अल-कायदा पर ठोस होमवर्क करने की जरुरत है।

अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को शुरुआती संकेत मिल रहे हैं कि अल-कायदा के आतंकवादियों ने अफगानिस्तान लौटना शुरू कर दिया है। पिछले 20 वर्षों में जब अमेरिका और सहयोगी देशों ने वहां पर सैन्य कार्रवाई की, तो ये आतंकी संगठन तितर-बितर हो गए थे। सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के उप निदेशक डेविड कोहेन ने एक दिन पहले ही यह बात मानी है कि अफगानिस्तान में अल-कायदा की गतिविधियों के कुछ संभावित संकेत दिखने लगे हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी ‘सीआईए’ का अनुमान, जिसमें बदलाव संभव है, उसके मुताबिक, यूएस को धमकी देने की क्षमता का पुनर्गठन करने में अल-कायदा को एक से दो साल लगेंगे।
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दूसरी ओर कैपिटल हिल पर मंगलवार को एक सुनवाई में, विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने सीनेट की विदेश संबंधी समिति को बताया कि अल-कायदा, अफगानिस्तान से हमले करने की अपनी क्षमता के मामले में बुरी तरह टूट चुका है। आज उसके पास वह क्षमता नहीं बची है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन भी कह चुके हैं कि उनका मिशन कामयाब रहा है। ओसामा बिन लादेन को मार दिया है। यूएस ने 'अलकायदा' को उठने लायक नहीं छोड़ा है।

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आईएस और अल कायदा ने पूरी दुनिया में फैलाया जाल

रिटायर्ड आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना, जो केरल के डीजीपी और सीआरपीएफ व बीएसएफ में बतौर एडीजी अपनी सेवाएं देने के साथ-साथ 46 किताबें एवं 76 से अधिक रिसर्च पेपर लिख चुके हैं, उनका कहना है कि सीआईए अभी अनुमान लगा रही है। हार्ड इंटेलिजेंस इनपुट का अभाव है। वह भी उस आतंकी संगठन के मामले में, जो अमेरिका को सबसे बड़ी चोट 9/11 पहुंचा चुका है। अल-कायदा के कई सदस्यों के बारे में अभी तक कुछ नहीं पता है। अमेरिकी फौज के हथियार, गोला बारूद, संचार उपकरण और गाड़ियां, अफगानिस्तान में मौजूद हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री खुद यह बात कह चुके हैं कि तालिबान के पास हमारे बहुत से हथियार हैं।

डॉ. अस्थाना बताते हैं, जब अमेरिका को अफगानिस्तान से वापस लौटना था तो हथियारों और दूसरे आतंकी संगठनों को पुख्ता तरीके से खत्म करने की योजना बनानी थी। महाशक्ति से यहीं पर चूक हो गई है। तालिबान और उसके सहयोगी आतंकी संगठनों के पास हथियारों की तंगी कभी नहीं रही। गोला-बारूद भी कम नहीं था। ये सब कहां से सप्लाई हो रहा था। अमेरिका उसे क्यों नहीं पकड़ पाया। लादेन मारा गया, अल-कायदा की कमर तोड़ दी, अब उसके संगठन को दोबारा से उठने में दो साल लगेंगे, ये सब जनता को भरोसा दिलाने के लिए तो ठीक है, लेकिन 'सीआईए' जैसी इंटेलिजेंस की जवाबदेही इससे तय नहीं होती। अल-कायदा को लेकर उसे पर्याप्त सबूत जुटाने होंगे।

दुनिया के कई देशों में इस बात की चर्चा होती रही है कि 9/11 के हमलों के बाद लादेन को मारने से लेकर अफगानिस्तान में 20 साल रहने के बाद अमेरिका को क्या हासिल हुआ है। क्या आतंकवाद पूरी तरह खत्म हो गया। 'सीआईए' ने अगस्त 2001 में राष्ट्रपति बुश को बताया था कि अल-कायदा बड़ा हमला कर सकता है। हमले को रोका नहीं जा सका। वजह, उस वक्त अल-कायदा ने, साइबर मामलों में खासी महारत हासिल कर ली थी। आज आईएस और अल कायदा, ये संगठन सोशल मीडिया नेटवर्किंग के जरिए अफगानिस्तान से बाहर जा चुके हैं। इन्होंने पाकिस्तान के अलावा भारत, दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व एशिया और अफ्रीका सहित कई देशों में जाल फैला दिया है।

भारत में एनआईए ऐसे कई मामलों का खुलासा कर चुकी है, जिसमें मुस्लिम समुदाय के युवा 'आईएस' के सदस्य बने हैं। डॉ. एनसी अस्थाना कहते हैं, अल-कायदा को खत्म करने के लिए अमेरिका को जो करना चाहिए था, वह नहीं हो सका। कुछ खामियां रह गई हैं। नतीजा, आज चरमपंथी गुट दोबारा से फन उठाने का प्रयास कर रहे हैं। सीआईए को ठोस सबूत जुटाने होंगे। 9/11 हमले के बाद सीआईए के पास ऐसे ठोस सबूत नहीं थे कि जिससे यह साबित हो सके कि हमला अल-कायदा ने ही किया है। घटनास्थल से मोहम्मद अत्ता का पासपोर्ट मिलना, ये बहुत विश्वसनीय बात नहीं थी। उसे हमलों का मुख्य अभियुक्त बनाया गया था। सीआईए को वह सब जानकारी जुटानी होगी, जिसके बल पर आतंकी संगठन यह सोच रखते हैं कि इस्लाम के दुश्मनों यानी पश्चिमी देशों पर हमला करना असंभव नहीं है, उसे मुश्किल कहा जा सकता है। सीआईए के डिप्टी डायरेक्टर डेविड कोहेन और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का बयान कुछ ऐसा ही इशारा करता है कि अल-कायदा दोबारा से अफगानिस्तान की जमीन से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के खिलाफ हमला करने की हिम्मत जुटा सकता है।
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