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एच-1बी वीजा पर बवाल: जेडी वेंस ने भारतीयों को बताया था ‘बंधुआ मजदूर’, भारत बोला- अपना इतिहास न भूले अमेरिका

Fri, 09 Oct 2026 01:46 PM IST
प्रशांत तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के एच-1बी कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ कहने पर भारत ने कड़ी नाराजगी जताई है। विदेश मंत्रालय ने बयान को अपमानजनक बताते हुए कहा कि भारतीय पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास में अहम योगदान देते हैं। ऐसे में उसे अपना इतिहास नहीं भूलना चाहिए। 

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विदेश मंत्रालय (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवरों को लेकर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की एक टिप्पणी पर भारत ने कड़ी नाराजगी जताई है। वेंस ने एच-1बी वीजा पर अमेरिका में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ बताते हुए आरोप लगाया था कि विदेशी कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम वेतन पर बाहर से लोगों को बुला रही हैं। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस बयान को न सिर्फ अनुचित, बल्कि बेहद अपमानजनक बताया है। मंत्रालय का कहना है कि इस तरह के शब्दों से गुलामी और औपनिवेशिक दौर की दर्दनाक यादें जुड़ी हैं। साथ ही, ऐसी टिप्पणियां अमेरिका की अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास में भारतीय पेशेवरों के योगदान को भी नजरअंदाज करती हैं।

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'भारतीय पेशेवरों का अपमान बर्दाश्त नहीं'
विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को साफ कहा कि अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवर अत्यधिक शिक्षित और कुशल हैं। वे वहां की अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षेत्र और नए आविष्कारों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में उन्हें ‘बंधुआ मजदूर’ कहना किसी भी तरह से उचित नहीं है। मंत्रालय ने यह भी याद दिलाया कि अमेरिका का इतिहास खुद प्रवासियों के योगदान से बना है। पीढ़ियों से दूसरे देशों के लोग वहां जाकर काम करते रहे हैं और उन्होंने अपनी मेहनत, कारोबार और नए विचारों के दम पर अमेरिका की तरक्की में योगदान दिया है। ऐसे में प्रवासियों के लिए अपमानजनक और औपनिवेशिक दौर की याद दिलाने वाले शब्दों का इस्तेमाल करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

जेडी वेंस ने आखिर क्या कहा था?
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने गुरुवार को वीजा धोखाधड़ी से जुड़े एक संवाददाता सम्मेलन में एच-1बी वीजा पर काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों पर निशाना साधा था। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विदेशी आउटसोर्सिंग कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन पर विदेशी कामगारों को नियुक्त करती हैं, जिससे स्थानीय लोगों के रोजगार और वेतन पर असर पड़ता है। वेंस के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति अमेरिका में एच-1बी वीजा पर काम कर रहा है, तो उसे उसी पद पर काम करने वाले अमेरिकी नागरिक के मुकाबले 20,000 डॉलर कम वेतन मिल रहा है।
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उन्होंने यह भी दावा किया कि विदेशी आउटसोर्सिंग कंपनियों के जरिए लाए गए कर्मचारियों और समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी नागरिकों के वेतन में 48,000 डॉलर तक का अंतर है। वेंस ने कहा कि कुछ कंपनियां विदेशों से कर्मचारियों को बुलाती हैं, अमेरिकी कामगारों की छंटनी करती हैं और कम वेतन देकर अपना मुनाफा बढ़ाती हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में विदेशी कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ कहा और यह भी आरोप लगाया कि ऐसे लोगों को अमेरिका में काम करने की अनुमति ही नहीं मिलनी चाहिए। ये वेतन संबंधी आंकड़े और आरोप वेंस के बयान का हिस्सा हैं।

भारत ने गिनाए दोनों देशों को होने वाले फायदे
विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि कुशल पेशेवरों का एक देश से दूसरे देश में जाकर काम करना भारत और अमेरिका, दोनों के लिए फायदेमंद है। भारतीय प्रतिभाओं को अमेरिका में बेहतर अवसर मिलते हैं, वहीं अमेरिकी कंपनियों को भी अनुभवी और कुशल कर्मचारी मिलते हैं। मंत्रालय के अनुसार, भारतीय पेशेवर अमेरिका में शोध, तकनीकी विकास, नए आविष्कार, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देते हैं। इससे कंपनियों को कारोबार बढ़ाने और नए रोजगार पैदा करने में मदद मिलती है। इसके अलावा, कंपनियों के शेयरधारकों को भी लाभ होता है। प्रतिभाशाली लोगों की आवाजाही दोनों देशों के साझा हितों से जुड़ी है। ऐसे में इस प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने वाले कदम दोनों देशों के लिए फायदेमंद नहीं हैं। मंत्रालय ने उम्मीद जताई कि इस मामले से जुड़े सभी पक्ष भारतीय पेशेवरों के योगदान और प्रतिभा के आदान-प्रदान से होने वाले लाभ को समझेंगे।

PERM कार्यक्रम पर अमेरिका के फैसले से क्या बदलेगा?
विदेश मंत्रालय ने अमेरिका के श्रम विभाग की ओर से स्थायी श्रम प्रमाणन यानी PERM कार्यक्रम को लेकर लिए गए फैसले पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय ने कहा कि PERM और एच-1बी वीजा दो अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। इसलिए PERM आवेदन पर रोक लगने का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में पहले से वैध एच-1बी वीजा रखने वाले लोगों का वीजा या उनका कानूनी दर्जा अपने आप प्रभावित हो जाएगा। उनके आश्रितों की स्थिति पर भी इस फैसले का अपने आप कोई असर नहीं पड़ता। हालांकि, मंत्रालय ने यह जरूर माना कि जिन कंपनियों पर यह फैसला लागू हुआ है, वहां काम करने वाले पात्र कर्मचारियों की स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। दूसरे शब्दों में, अमेरिका में काम करने की मौजूदा अनुमति और वहां स्थायी रूप से बसने की प्रक्रिया को अलग-अलग समझना जरूरी है।

इंफोसिस से लेकर कॉग्निजेंट तक, कई बड़ी कंपनियों पर कार्रवाई
अमेरिका के श्रम मंत्री कीथ सॉन्डरलिंग ने इससे पहले घोषणा की थी कि अमेरिकी सरकार दुनिया की कुछ बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों को PERM कार्यक्रम से निलंबित कर रही है। इनमें कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी जैसी कंपनियों के नाम शामिल हैं। इस सूची में अमेरिकी टेक कंपनियां माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी भी शामिल हैं। अमेरिकी श्रम विभाग ने इस कार्रवाई के पीछे कई सक्रिय संघीय जांचों का हवाला दिया है। हालांकि, जांच का जिक्र अपने आप में किसी कंपनी के दोषी साबित होने का प्रमाण नहीं है।

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भारत की पूरे मामले पर नजर
विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर रख रहा है। भारत का रुख स्पष्ट है कि भारतीय पेशेवरों के योगदान को नजरअंदाज करके या उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करके दोनों देशों के बीच प्रतिभा और तकनीक के आदान-प्रदान के महत्व को कम नहीं किया जा सकता। भारत और अमेरिका के बीच तकनीक, शोध, कारोबार और रोजगार के क्षेत्र में गहरा जुड़ाव है। ऐसे में एच-1बी वीजा और PERM कार्यक्रम से जुड़े फैसले केवल आव्रजन नियमों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका असर कंपनियों, कर्मचारियों और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।

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