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राज्यसभा चुनाव: कौन हैं वो आठ चेहरे जिन्हें भाजपा ने यूपी से बनाया उम्मीदवार, सियासत से इनका कितना पुराना नाता

Mon, 05 Oct 2026 06:36 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

यूपी राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने आठ उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। जानिए कौन हैं ये चेहरे, क्या है जातीय गणित और आठवां उम्मीदवार जिताने की क्या है रणनीति।
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यूपी में राज्यसभा चुनाव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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16 अक्तूबर को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए सियासी दलों की ओर से प्रत्याशियों के नाम का एलान जारी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सोमवार को उत्तर प्रदेश से खाली हो रहीं 10 राज्यसभा सीटों के लिए अपने आठ प्रत्याशियों के नाम का एलान कर दिया। इन प्रत्याशियों में यूपी भाजपा संगठन से लेकर सियासत के पुराने चेहरे तक शामिल हैं। 
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भाजपा की तरफ से जिन नेताओं को राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया गया है, वे कौन हैं? इनमें से कितने नेताओं का राजनीति से पुराना जुड़ाव रहा है? नई एंट्री वाले चेहरे कौन से हैं? अगर राज्यसभा चुनाव यूपी की 10 सीटों के लिए तय हुआ है तो पार्टी ने 8 चेहरों को ही क्यों उतारा? आइये जानते हैं...

राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने किन चेहरों को उम्मीदवार बनाया?

भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए आठ नेताओं को अपना उम्मीदवार बनाया है।



धर्मपाल सिंह: भाजपा के उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री  हैं।
राधाकांत ओझा: इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, दो बार बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं।
प्रकाश पाल: भाजपा के कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष हैं।
विद्यासागर सोनकर: पूर्व सांसद, विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) और संगठन में प्रदेश महामंत्री रहे हैं।
गोपी कृष्णा पाण्डेय: भाजपा के किसान मोर्चा के सदस्य हैं।
प्रियंका सिंह रावत: बाराबंकी से पूर्व लोकसभा सांसद रहीं हैं।
राम प्रताप सिंह चौहान: भाजपा के प्रदेश महामंत्री, पश्चिमी क्षेत्र के प्रभारी और आगरा की एत्मादपुर सीट से पूर्व विधायक रहे हैं।
श्रुति गंगवार: वरिष्ठ भाजपा नेता संतोष गंगवार की बेटी। बरेली-रुहेलखंड क्षेत्र में भाजपा की सक्रिय कार्यकर्ता हैं।

भाजपा ने राज्यसभा उम्मीदवारों में भी दिया जातीय समीकरणों पर ध्यान। - फोटो : अमर उजाला

भाजपा ने जिन चेहरों के दिया मौका, उनकी पहचान क्या?

1. धर्मपाल सिंह

पहचान और पृष्ठभूमि: उत्तर प्रदेश सरकार में पशुपालन एवं डेयरी विकास कैबिनेट मंत्री और आंवला (बरेली) से विधायक हैं। वे इस सीट से पांच बार चुनाव जीत चुके हैं। वे लोध (ओबीसी) समुदाय से आते हैं। 
    
सियासी सफर: पांच बार के विधायक रहे धर्मपाल सिंह सिंचाई और श्रम जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।  
 

2. प्रियंका सिंह रावत

पहचान और पृष्ठभूमि: वर्तमान में भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष और बाराबंकी की पूर्व सांसद। वे पासी (दलित) समुदाय की प्रमुख महिला नेता हैं।

शिक्षा और सियासी सफर: राजनीति विज्ञान में एमए. और मास कम्युनिकेशन में डिप्लोमा किया। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बाराबंकी सीट से कांग्रेस के दिग्गज नेता पीएल पुनिया को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी।

3. विद्यासागर सोनकर

पहचान और पृष्ठभूमि: 21 जुलाई 1961 को जन्मे विद्यासागर सोनकर पढ़ाई के दौरान ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे। वे जौनपुर के निवासी हैं और खटिक (दलित) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। वे मौजूदा समय में विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) हैं। 

संगठन और सियासी सफर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पृष्ठभूमि से आने वाले सोनकर ने 1985 में पार्टी के बूथ अध्यक्ष के रूप में शुरुआत की। वर्ष 1996 में सैदपुर सीट (अब मछलीशहर) से लोकसभा सांसद चुने गए थे। वे भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश महामंत्री रह चुके हैं।


4. रामप्रताप सिंह चौहान

पहचान और पृष्ठभूमि: मौजूदा समय में भाजपा के प्रदेश महामंत्री और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी। वे राजपूत (ठाकुर) समुदाय से आते हैं।

संगठन और सियासी सफर: पेशे से अधिवक्ता चौहान ने 1991 में भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के मंडल अध्यक्ष के तौर पर राजनीतिक सफर शुरू किया। साल 2017 में आगरा की एत्मादपुर सीट से विधायक चुने गए। 

5. श्रुति गंगवार

पहचान और पृष्ठभूमि: झारखंड के राज्यपाल और पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार की बेटी। वे बरेली/रुहेलखंड क्षेत्र में कुर्मी (ओबीसी) समाज का प्रमुख चेहरा हैं। आईआईटी रुड़की से केमिकल इंजीनियरिंग में स्नातक और आईआईएम बंगलूरू से एंटरप्रेन्योरशिप मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद उन्होंने आईटी क्षेत्र में करियर शुरू किया। इंफोसिस से पेशेवर सफर की शुरुआत करने के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं पर काम किया।

सक्रियता: वर्तमान में अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक की चेयरपर्सन हैं और बरेली के बहेड़ी विधानसभा क्षेत्र में सामाजिक-राजनीतिक रूप से सक्रिय कार्यकर्ता हैं। श्रुति गंगवार लंबे समय से समाज सेवा और संगठन के कार्यों से जुड़ी रही हैं।  2004, 2009, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा के अभियानों में भाग लिया। 2019 में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ क्षेत्र में अभियान चलाया और 2022 के विधानसभा चुनाव में बरेली लोकसभा क्षेत्र की सभी विधानसभाओं में संगठन से जुड़ी गतिविधियों में भागीदारी की। उनके पिता संतोष गंगवार बरेली से आठ बार सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

भाजपा उम्मीदवार श्रुति गंगवार - फोटो : अमर उजाला

6. प्रकाश पाल

पहचान और पृष्ठभूमि: कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष और अति-पिछड़ा (ओबीसी) समुदाय के प्रमुख सांगठनिक नेता।

संगठन का सफर: आरएसएस और एबीवीपी की पृष्ठभूमि से जुड़े प्रकाश पाल तीन दशक से अधिक समय से संगठन में समर्पित कार्यकर्ता और प्रचारक रहे हैं। वे संगठन में प्रदेश महामंत्री और प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारियां भी निभा चुके हैं।


7. गोपी कृष्ण पांडेय

पहचान और पृष्ठभूमि: मूल रूप से बलिया (रसड़ा) के रहने वाले पांडेय आरएसएस और एबीवीपी से जुड़े रहे हैं। उन्हें संगठन के प्रबुद्ध ब्राह्मण नेताओं में गिना जाता है।

संगठन का सफर: वे पार्टी के किसान मोर्चा से जुड़े रहे हैं, कई राज्यों में किसान मोर्चा के प्रभारी रहे हैं और भाजपा के प्रदेश मंत्री के रूप में कार्य कर चुके हैं।
 

प्रकाश पाल (बाएं) व गोपी कृष्ण पांडेय (दाएं)। - फोटो : अमर उजाला

8. राधाकांत ओझा

पहचान और पृष्ठभूमि: प्रतापगढ़ के रानीगंज के निवासी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षित ओझा भी आरएसएस से जुड़ाव रखते हैं। 38 वर्षों का कानूनी अनुभव रखने वाले राधाकांत ओझा ने वर्ष 1988 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से वकालत की शुरुआत की थी। 

चुनावी और सियासी जुड़ाव: ओझा इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के दो बार के अध्यक्ष रहे हैं। तीसरी बार अध्यक्ष बनने के लिए इस बार भी मैदान में थे, लेकिन उन्हें तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। ओझा उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता स्वर्गीय केशरीनाथ त्रिपाठी के बेहद खास माने जाते थे। छात्र जीवन (1977) से शुरू हुआ यह जुड़ाव हाईकोर्ट में वकालत के दौरान और गहरा हुआ। ओझा के बड़े भाई शिवाकांत ओझा प्रतापगढ़ में रानीगंज से विधायक थे और सपा सरकार में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कई अहम मंत्रालयों में कैबिनेट मंत्री रहे।


जब 10 सीटों पर चुनाव तो भाजपा ने आठ उम्मीदवार क्यों घोषित किए?

उत्तर प्रदेश में कुल 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होना है। यहां विधानसभा में अलग-अलग दलों के विधायक ही वोटिंग में हिस्सा लेंगे। किसी प्रत्याशी को जिताने के लिए कम से कम 37 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। विधानसभा के मौजूदा संख्याबल को देखा जाए तो इस वक्त राज्य में कुल 397 विधायक हैं। 

विधानसभा के मौजूदा संख्याबल के मुताबिक सत्ताधारी एनडीए गठबंधन  के 292 सदस्य हैं। इस संख्या बल के हिसाब से सत्ताधारी गठबंधन 10 में सात सीटों पर आसानी से जीत दर्ज कर सकता है। वहीं, 101 सदस्यों वाली सपा के लिए दो सीटों पर जीत तय है। एक सीट पर मामला फंस सकता है। 

एक सीट पर खेल करने की भाजपा की तैयारी
अगर यूपी विधानसभा के आंकड़ों को देखा जाए तो आठवें उम्मीदवार के लिए एनडीए के पास 33 प्राथमिक वोट हैं। आठवें उम्मीदवार को जिताने के लिए उसे चार वोट की और जरूरत पड़ेगी। अगर राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल के दो वोट उसे मिलते हैं तो भी उसे दो वोट और चाहिए होंगे।  

विपक्षी गठबंधन की बात करें तो सपा को 101 सदस्यों के अलावा कांग्रेस के दो विधायकों का समर्थन भी उसे मिल सकता है। ऐसे में विपक्षी गठबंधन का संख्याबल 103 हो जाएगा। इस स्थिति में तीसरे उम्मीदवार के लिए उसके पास प्रथम वरीयता के 29 अतरिक्त वोट रहेंगे। यानी, विपक्ष को तीसरा उम्मीदवार जिताने के लिए प्रथम वरीयता के आठ अतिरिक्त वोट की जरूरत पड़ेगी।
 
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राज्यसभा चुनाव के लिए यूपी से खाली हो रही सीटें। - फोटो : अमर उजाला
भाजपा ने नहीं दोहराए पुराने चेहरे
इस बार राज्यसभा चुनाव में गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा ने पुराने किसी भी सांसद को टिकट नहीं दिया है। सभी आठ उम्मीदवारों को बदला गया है। इनमें सबसे बड़ा नाम- हरदीप सिंह पुरी का है, जो कि मौजूदा समय में केंद्र सरकार में पेट्रोलियम मंत्री के पद पर काबिज हैं। अब दोबारा टिकट न मिलने और राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने की स्थिति में पुरी को अपने पद से इस्तीफा देना होगा।

दूसरी तरफ दिनेश शर्मा अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले ही राज्यसभा सीट से इस्तीफा दे चुके हैं। उन्हें अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। 
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