यूपी में दूसरी बार प्रचंड बहुमत की सरकार बनाने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहुत परिपक्व सियासी पारी खेलनी शुरू कर दी है। इसका ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 36 सीटों के लिए हुए चुनाव हैं। इनमें से 27 सीटों पर विपक्ष के उम्मीदवारों के साथ मुकाबला हुआ। उनमें भी योगी आदित्यनाथ की मंशा के हिसाब से ही टिकट बंटा और 24 प्रत्याशियों की जीत हुई है। 9 प्रत्याशी पहले ही निर्विरोध चुने जा चुके हैं। शेष तीन निर्दलीय प्रत्याशी जीते हैं, वह भी मुख्यमंत्री और भाजपा के ही करीबी माने जाते हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वालों का मानना है कि भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। एमएलसी चुनाव के बहाने उन्होंने न केवल विपक्ष की कमजोरी को उजागर किया, बल्कि बाहुबली समझे जाने वाले प्रत्याशियों से दूर रहकर भी उन्हें अपने साथ बनाए रखने का कौशल भी दिखा दिया। राजनीति का दांव भी ऐसा कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा है।
अक्षय प्रताप सिंह भी विधान परिषद सदस्य बने
प्रयागराज से भाजपा के नेता ज्ञानेश्वर शुक्ला कहते हैं कि राजनीति में सबकुछ नहीं कहा जाता। बहुत कुछ परिस्थितियां कह देती हैं। एक अन्य नेता का कहना है कि जिस तरह से रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की कुंडा सीट से चुनाव में अपनी विधायकी फंसी गई थी, वहां बिना भाजपा के सहयोग के पार होना मुश्किल था। प्रतापगढ़ के ही एक नेता कहते हैं कि अक्षय प्रताप सिंह भी विधान परिषद के सदस्य हो गए। वह दूसरा उदाहरण बनारस सीट से देते हैं। कहते हैं बनारस में भाजपा के प्रत्याशी सुदामा पटेल ने पार्टी के ही नेताओं पर असहयोग का आरोप लगाया है। वहां से सेंट्रल जेल में बंद बाहुबली नेता बृजेश सिंह की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह चुनाव जीत गई हैं। वरिष्ठ पत्रकार श्याम नारायण पांडे कहते हैं कि बिना भाजपा के सहयोग के अन्नपूर्णा सिंह का चुनाव जीतना संभव ही नहीं था। पांडे इसे भाजपा के साथ मधुर समीकरण बताते हैं।
मिर्जापुर-सोनभद्र क्षेत्र की सीट से श्याम नारायण सिंह (विनीत सिंह) निर्विरोध एमएलसी चुने गए। विनीत भी बाहुबली हैं। तरुण शुक्ला कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समय में विनीत सिंह का निर्विरोध एमएलसी बनना ही कहीं न कहीं सॉफ्ट कार्नर का संकेत देता है।
रिशु व प्रिंसू को मिली बड़ी कामयाबी
आजमगढ़ सीट से भाजपा ने बाहुबली नेता रमाकांत यादव के बेटे अरुण कांत यादव को टिकट दिया था। लेकिन वहां से भाजपा से निष्कासित यशवंत सिंह के पुत्र विक्रांत सिंह रिशू को चुनाव में सफलता मिली है। सबसे अहम है जौनपुर से बृजेश सिंह उर्फ प्रिंसू को एमएलसी का टिकट मिलना और चुनाव जीतना। हालांकि बृजेश सिंह उर्फ प्रिंसू एक अच्छे, व्यावहारिक नेता हैं। लेकिन उनके ऊपर बाहुबली नेता धनंजय सिंह की छाया का ठप्पा लगा रहता है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि पहली बार भी प्रिंसू धनंजय सिंह के सहयोग, समर्थन से एमएलसी बने थे। दूसरी बार भी उन्होंने यह जीत धनंजय सिंह के बूते हासिल की है। यहां क्लाइमेक्स यह भी है कि धनंजय सिंह मल्हनी सीट से विधानसभा चुनाव लड़कर हार गए। भाजपा के तमाम नेता चाहते थे कि यहां से पार्टी प्रत्याशी न उतारे। ऐसा होने पर धनंजय सिंह समाजवादी पार्टी की झोली से सीट खींच लेंगे। लेकिन एक बाहुबली नेता से दूरी बनाने का संदेश देने के लिए भाजपा ने पूर्व सांसद केपी सिंह को मैदान में उतार दिया था। इसके चलते धनंजय की हार भी तय हो गई, लेकिन भाजपा ने प्रिंसू को मैदान में उतारने में कोई संकोच नहीं किया और वह चुनाव जीते भी।