उत्तर प्रदेश प्रशासन ने राज्य के सभी मदरसों का सर्वे कराने का निर्देश देकर अल्पसंख्यक समुदाय के मन में एक नई आशंका को जन्म दे दिया है। अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ नेताओं ने इसको लेकर बयानबाजी भी शुरू कर दी है, तो मुसलमानों की बड़ी धार्मिक संस्था जमीअत-उलमा-ए-हिंद भी इस पर बारीक निगाह रखे हुए है। वहीं, सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री दानिश आजाद ने कहा है कि सरकार मदरसों की स्थिति का सर्वे कराकर उसको आधुनिक बनाने का काम करना चाहती है। इससे मुसलमान समुदाय के बच्चों का हित होगा। यदि सरकार के इरादे सही हैं तो इस मामले पर अल्पसंख्यक समुदाय के मन में आशंका के बादल क्यों मंडरा रहे हैं?
मुसलमानों के मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि अमीर मुसलमानों के बच्चे बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि पसमांदा समुदाय के गरीब बच्चों को शिक्षा के लिए मदरसा ही एकमात्र विकल्प बचता है। इन मदरसों में ज्यादातर केवल धार्मिक शिक्षा दी जाती है, जिससे बाद में वे किसी अच्छे रोजगार के लिए उपयुक्त उम्मीदवार नहीं बन पाते। इससे मजबूरन उन्हें मेहनत-मजदूरी या छोटे-छोटे कामकाज करने पड़ते हैं और वे गरीबी के दुष्चक्र से कभी बाहर नहीं निकल पाते।
डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने कहा कि सरकार मदरसों का सर्वे कराकर इनकी स्थिति सुधारना चाहती है। अब बच्चों को केवल धार्मिक शिक्षा देना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है। पीएम नरेंद्र मोदी लगातार मदरसों के छात्रों के एक हाथ में कुरान तो दूसरे में कंप्यूटर होने की बात करते रहे हैं। यदि सरकार इस तरह मदरसों का विकास करना चाहती है, तो इससे गरीब मुसलमानों के बच्चों की स्थिति सुधरेगी। उन्होंने कहा कि सरकार के इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए।
जमाते इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो. सलीम इंजीनियर ने अमर उजाला से कहा कि यदि सरकार मदरसों में कोई सुधार करना चाहती है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन इस तरह का कोई भी कदम उठाने के पहले अल्पसंख्यक समुदाय को भरोसे में लिया जाना चाहिए। मुसलमानों को भरोसे में लिए बिना इस तरह के कदम उठाने से सरकार की मंशा पर संदेह पैदा होता है।
प्रो. सलीम इंजीनियर ने कहा कि उत्तर प्रदेश में हजारों ऐसे स्कूल हैं, जहां कक्षाएं तक नहीं हैं। उनमें शौचालय या पानी पीने की व्यवस्था तक नहीं है। यदि सरकार की मंशा साफ है तो उसे सबसे पहले इन स्कूलों की हालत सुधारनी चाहिए, जहां हर समाज और हर वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। इससे हर समुदाय के लोगों का भला होता। सरकारी स्कूलों की खराब हालत होते हुए भी सरकार केवल मुसलमानों के बच्चों के पढ़ने की जगह मदरसों को ही क्यों सुधारना चाहती है, यही कारण है कि सरकार के इस कदम पर संदेह पैदा होता है।