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Ghosi Bypolls: इन सात ने दिया अखिलेश को कड़ा संदेश! तभी सधी है घोसी में उपचुनाव की सियासी बागडोर

सार

अखिलेश यादव यूं ही घोसी नहीं पहुंचे हैं । 2022 के बाद हुए पांच विधानसभा और तीन लोकसभा के उपचुनाव में से अखिलेश यादव सिर्फ मैनपुरी में ही डिंपल यादव का प्रचार करने मैदान में उतरे। जबकि साथ अन्य सीटों पर वह प्रचार करने नहीं गए। अब बदले सियासी समीकरणों में अखिलेश यादव घोसी के उपचुनाव में पहुंचे हैं।
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इंडिया में सपा का भविष्य होगा तय। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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अखिलेश यादव ने आजमगढ़ में जब सीट खाली की तो उनके चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव चुनावी मैदान में उतरे। यहां हुए उपचुनाव में लड़ाई समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच में थी। लेकिन अखिलेश यादव आजमगढ़ के उपचुनाव में गए ही नहीं। नतीजा हुआ कि उनके भाई धर्मेंद्र यादव यहां से चुनाव हार गए। इसी तरह बीते एक साल में यूपी में हुए पांच विधानसभा और तीन लोकसभा के उप चुनाव में अखिलेश यादव ने सिर्फ मैनपुरी को छोड़कर सभी जगहों पर चुनाव प्रचार से दूरियां बनाई। नतीजा हुआ की सभी सीटें समाजवादी पार्टी हार गई। सियासी गलियारों में कहा यही जा रहा है कि जिन सात विधानसभा और लोकसभा के उपचुनाव में अखिलेश को हार का सामना करना पड़ा इससे उनको एक कड़ा संदेश मिला। चूंकि अब लोकसभा चुनावों से पहले विपक्षी दलों के बड़े गठबंधन INDIA में सीटों के बंटवारे को लेकर भी माथा पच्ची हो रही है। ऐसे में समाजवादी पार्टी को अपने मन मुताबिक सीटों के लेनदेन में बातचीत करने के लिए घोसी के उपचुनाव के परिणाम बड़ा आधार बन सकते हैं।
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अखिलेश यादव ने अपनी पत्नी डिंपल यादव के मैनपुरी में हुए उपचुनाव में प्रचार में हिस्सा लिया था। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार जीडी शुक्ल कहते हैं कि जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में पांच विधानसभा के उपचुनाव हुए। मैनपुरी के अलावा दो लोकसभा के उपचुनाव हुए। अखिलेश यादव किसी भी उपचुनाव में प्रचार करने के लिए नहीं गए। शुक्ल कहते हैं कि जिन उपचुनाव में अखिलेश यादव ने प्रचार प्रसार नहीं किया वहां पर सब जगह पार्टी चुनाव हार गई। इसमें आजम खान के वर्चस्व वाली रामपुर और मुरादाबाद की भी सीटें थीं। जबकि एक सीट आजमगढ़ की तो खुद अखिलेश यादव के छोड़ने की वजह से रिक्त हुई थी और वहां पर उनके चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव चुनावी मैदान में थे। 

सियासी जानकारों का कहना है कि इन सातों सीटों पर मिली हार के बाद अखिलेश यादव को एक बड़ा संदेश भी मिला। यही वजह है कि बदली हुई सियासी परिस्थितियों में अखिलेश यादव ने न सिर्फ घोसी में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी सुधाकर सिंह के पक्ष में प्रचार-प्रसार किया, बल्कि भारतीय जनता पार्टी पर जमकर हमला भी बोला। दरअसल, घोसी में होने वाले उपचुनाव के परिणाम महज एक विधानसभा के उपचुनाव के परिणाम ही नहीं है बल्कि यूपी के सियासत के और भी कई मायने भी बताने वाले हैं।
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घोसी के लिए पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरी है सपा
उत्तर प्रदेश में होने वाले घोसी उपचुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरी है। ताकत भी इस तरह की उपचुनावो में चुनाव प्रचार से दूर रहने वाले अखिलेश यादव जनसभाएं और रैलियां कर रहे हैं। राजनीतिक जानकार बीएन दत्ता बताते हैं कि अखिलेश यादव के लिए यह चुनाव महज उपचुनाव ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी के राष्ट्रीय फलक पर तमाम विपक्षी दलों के बीच में चमकने का एक मौका भी है। इस उपचुनाव के परिणाम यह साबित करेंगे कि आने वाले लोकसभा चुनावों से पहले किस तरीके का सियासी ताना-बाना यूपी में बन जाए। 

राजनीतिक विश्लेषक अतहर हुसैन कहते हैं कि घोसी उपचुनाव के परिणाम भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। वह कहते हैं अगर घोसी उपचुनाव का परिणाम अगर समाजवादी पार्टी के पक्ष में आता है तो अखिलेश यादव लोकसभा के चुनाव से पहले यूपी में खुद को और मजबूत साबित करके उभरेंगे। इस चुनाव परिणाम के नतीजे सिर्फ अखिलेश यादव को ही नहीं बल्कि सपा और कांग्रेस के बीच बने INDIA गठबंधन के बाद होने वाली सीटों पर भी अच्छा खासा प्रभाव डालेंगे। 

इंडिया में सीट बंटवारे के लिए अहम साबित होंगे घोसी उपचुनाव
राजनीतिक विश्लेषक अतहर हुसैन कहते हैं कि घोसी उपचुनाव के नतीजे से गठबंधन के बीच होने वाली सीटों के बंटवारे में अहम कड़ी मानी जा रही है। वह कहते हैं कि आज के हालात में कांग्रेस ने समर्थन तो समाजवादी पार्टी को घोसी उपचुनाव में जरूर दिया है लेकिन वह अपनी सियासी तैयारी के चलते उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटों की मांग कर रही है। जबकि अंदरूनी तौर पर चर्चा यही है कि जितनी सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ने की मांग कर रही है वह समाजवादी पार्टी देने की स्थिति में नहीं है।

ऐसे में अगर घोसी के उपचुनाव में समाजवादी पार्टी जीत जाती है तो वह सीटों पर और खुलकर अपनी बात रखने की मजबूत स्थिति में आ जाएगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दरअसल 2022 में हुए विधानसभा चावन के बाद में होने वाले चुनाव में समाजवादी पार्टी सिर्फ मैनपुरी को छोड़कर सभी जगह चुनाव हार गई। ऐसे में अगर कांग्रेस सपा को उसी उपचुनावों के परिणाम के आधार पर सपा से अपने लिए ज्यादा सीट छोड़ने की बात कर सकती है। 

कांग्रेस का सपा को समर्थन देना भी बड़ा संदेश
यही नहीं घोसी में 5 सितंबर को होने वाले उपचुनाव से एक साथ कई सियासी तीर निशाने पर लगाए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सियासी तीर कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी को कांग्रेस ने समर्थन देकर छोड़ा है। राजनीतिक विश्लेषक अरुण सिंह कहते हैं कि कांग्रेस का समाजवादी पार्टी को समर्थन देना सीधे तौर पर घोसी चुनाव को रोचक बना रहा है। वह कहते हैं कि आज के सियासी परिदृश्य में कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में उतना जनाधार नहीं है जितना की अन्य पार्टियों का है, लेकिन समर्थन देकर कांग्रेस ने एक माहौल बनाने का काम जरूर किया है।

अरुण सिंह कहते हैं यह माहौल NDA वर्सेज I.N.D.I.A के तौर पर सामने आया है। घोसी के उपचुनाव में राष्ट्रीय लोकदल ने भी समाजवादी पार्टी को समर्थन देकर I.N.D.I.A गठबंधन को इस उपचुनाव में मजबूत किया है। सियासी जानकारों का मानना है कि अब घोसी के उपचुनाव में जो लड़ाई लड़ी जा रही है वह 2024 के लिए तैयार हुए दो बड़े गठबंधनों के बीच की लड़ाई हो गई है।
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