उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों के मतदान के सभी चरण पूरे हो गए। इन चुनावों में न तो कोई लहर दिखाई दी और न ही कोई ऐसा एक मुद्दा जो पूरे प्रदेश में चल रहा हो। इसलिए यूं तो पूरा चुनाव हर सीट पर स्थानीय समीकरणों और सामाजिक गोलबंदी पर टिक गया है, लेकिन कुल मिलाकर मुकाबला नरेंद्र मोदी के सियासी करिश्मे, अखिलेश यादव की युवा लोकप्रिय छवि और मायावती की सामाजिक संरचना केबीच है। इसलिए चुनावी महाभारत में मैदान वही मारेगा, जिसने अपने पक्ष में अपने जनाधार वर्ग की अधिकतम गोलबंदी कराते हुए उसमें कुछ अतिरिक्त मतों को जोड़ने में कामयाबी पा ली है।
हालांकि हर दल अपने पक्ष में हवा बहने और बहुमत आने का दावा कर रहा है। पहले तीनों दलों ने कुल 403 सीटों में से 300 सीटें जीतने तक का दावा किया जो अब सिमट कर साधारण बहुमत यानी 203 सीटों तक सिमट गया है। निजी बातचीत में भाजपा सपा कांग्रेस गठबंधन और बसपा तीनों दलों केनेता मानते हैं कि हर सीट पर कड़ा तिकोनीय मुकाबला रहा है, लेकिन फिर अपने पक्ष में वोटों के ध्रुवीकरण का दावा भी करते हैं।
नौ मार्च को एग्ज़िट पोल आएंगे। इनसे कुछ संकेत मिल सकते हैं लेकिन बिहार विधानसभा चुनावों में जिस तरह एग्ज़िट पोल्स में गड़बड़झाला हुआ, उससे 11 मार्च को मतगणना तक अंतिम नतीजों को लेकर उत्सुकता बनी रहेगी।
सेंटर फॉर सोशल डेवलेपमेंट स्टडीज़ (सीएसडीएस) से जुड़े वरिष्ठ सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दूबे का कहना है कि उत्तर प्रदेश चुनावों में कोई ऐसा एक विमर्श नहीं बन सका है जिसके आधार पर पूरे प्रदेश में कोई लहर या हवा बनी हो। पूरे चुनाव के नतीजों का दारोमदार इस बात पर है कि कौन सा राजनीतिक खेमा अपने जनाधार वर्ग का किस हद तक अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करवाकर कुछ अतिरिक्त वोट जुटा ले।
'सपा सरकार में यादव वर्चस्व के खिलाफ कुछ वर्गों में नाराजगी भी है'
फाइल फोटो
दूबे के मुताबिक भाजपा की जीत की सबसे बड़ी शर्त है कि अगर उसके पक्ष में 80 फीसदी सवर्ण, 65 से 70 फीसदी गैर यादव पिछड़े और गैर जाटव दलित मतदाताओं का एकतरफा ध्रुवीकरण हो सके। जबकि सपा कांग्रेस गठबंधन को जीत के लिए 70 से 80 फीसदी यादव और मुस्लिम मतदाताओं के जबर्दस्त ध्रुवीकरण और गैर यादव पिछड़ों के 30 और सवर्णों में कम से कम 30 फीसदी समर्थन हासिल करना जरूरी है।
इसी तरह बसपा अपने दलित जनाधार को पूरी तरह एकजुट रखकर और उसमें कम से कम 60 से 70 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ने और सवर्ण व अन्य पिछडे़ वर्गों में सेंध लगाकर ही अपनी जीत का रास्ता बना सकती है।
कांग्रेस सपा गठबंधन के चुनाव रणनीतिकार भी मानते हैं कि भाजपा और नरेंद्र मोदी की कुछ खास वर्गों में लोकप्रियता अभी बरकरार है और राज्य में पांच साल की सपा सरकार में यादव वर्चस्व के खिलाफ कुछ वर्गों में एक नाराजगी भी है। इसलिए प्रदेश में घूमने पर लोग भाजपा के पक्ष में या सपा के खिलाफ बात करते हुए मिल जाते हैं। लेकिन वहीं दूसरी तरफ सपा केजनाधार वर्ग में अपनी सरकार दोबारा बनाने का जुनून भी है और खासकर नौजवानों में अखिलेश यादव और राहुल गांधी की जोड़ी केप्रति एक आकर्षण है।
उन्हें लगता है कि यह युवा जोड़ी प्रदेश में कुछ नया कर दिखाएगी। इसलिए दावा है कि सपा कांग्रेस गठबंधन न सिर्फ अपने जनाधार वर्ग को एकजुट रखने में कामयाब रहा है, बल्कि उसे नौजवानों और महिलाओं का एक नया समर्थन भी मिल रहा है, जिससे उसकी जीत की संभावनाएं बेहतर बन रही हैं।
लेकिन बहुजन चिंतक और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान के शिक्षक प्रो.विवेक कुमार का मानना है कि बसपा केप्रति जो झुकाव दलितों, अल्पसंख्यकों और अति पिछड़ों का बना है, उसे मीडिया और विश्लेषक नजरअंदाज कर रहे हैं या समझ नहीं पा रहे हैं। प्रो.कुमार बसपा केपूर्ण बहुमत का दावा करते हुए कहते हैं कि भाजपा न तो बसपा के दलित जनाधार में सेंध लगा सकी है और न ही उसे गैर यादव पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों में उतना समर्थन मिला जो जीत केलिए जरूरी है। जबकि उसके सवर्ण जनाधार का चार हिस्सों में बंटवारा हुआ है।