उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी पारा चढ़ने लगा है। भाजपा, सपा, बसपा समेत अन्य राजनीतिक दल सत्ता के इस संग्राम में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते। हालांकि, कोरोना की वजह से चुनाव आयोग ने चुनावी रैलियों, जनसभाओं और रोड शो पर प्रतिबंध लगा रखा है। इससे पहले ही भाजपा और सपा ने कई बड़ी चुनावी रैलियों के जरिए जनता तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन बसपा की ओर से अब तक एक भी बड़ी रैली नहीं की गई। अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह बसपा का उतना हो हल्ला भी नहीं मच रहा है, लेकिन पार्टी ने पहले चरण के घोषित उम्मीदवारों के नाम से जातिगत समीकरणों को साधते हुए बड़ी चाल चल दी है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, बसपा सुप्रीमो मायावती ने न सिर्फ इस बार 2007 वाला सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाया है, बल्कि यूथ फैक्टर का तड़का भी लगाया है। अब यह विधानसभा चुनाव में कितना असर डालेगा? यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन जातिगत समीकरणों के आधार पर फिलहाल पहली सूची में बसपा भी अन्य राजनीतिक दलों से कदमताल मिलाती हुई नजर आ रही है। बसपा सुप्रीमो ने अपने जन्मदिन के अवसर पर पार्टी में काम कर रहे युवाओं को अपना भतीजा और भतीजी कहकर जातिगत समीकरणों के साथ-साथ युवाओं को टारगेट की कोशिश की।
बसपा से जुड़े एक कद्दावर नेता कहते हैं कि पार्टी का चर्चा में ना रहने का यह मतलब नहीं है कि वह लड़ाई में ही नहीं है। बहुत लंबे समय तक मायावती के रणनीतिकारों में शामिल रहे नेता कहते हैं कि बसपा ने जो टिकट घोषित किए हैं, उससे दूसरी राजनीतिक पार्टियों को अंदाजा लगा लेना चाहिए कि चुनावी मैदान में बसपा सभी को कड़ी टक्कर दे सकती है।
बसपा के बड़े नेताओं के मुताबिक, मायावती ने जिन 53 प्रत्याशियों की सूची जारी की है उनमें आधे से ज्यादा की उम्र 50 साल से कम है। वह कहते हैं कि इस बार टिकट देने की प्रक्रिया में सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन अपरोक्ष रूप से मायावती के भतीजे आकाश आनंद का भी हस्तक्षेप रहा है। यही वजह है कि बसपा ने शुक्रवार को जारी 53 प्रत्याशियों की सूची में 51 पुराने चेहरे बदल दिए हैं। इसमें भी आधे से ज्यादा प्रत्याशियों की उम्र 50 साल से कम है। वह कहते हैं कि बसपा ही एक ऐसी पार्टी है जिसने सबसे ज्यादा प्रत्याशी बदले हैं।
मायावती के भतीजे की टिकट में दखल
बसपा ने शुक्रवार को 53 प्रत्याशियों की सूची जारी की है। इसमें पार्टी ने 15 सवर्ण जिसमें 10 ब्राह्मण, 15 ओबीसी और 14 मुसलमानो समेत 9 एससी/एसटी प्रत्याशियों को टिकट दिया है। बसपा के चुनावों की रणनीति बनाने वाले प्रमुख नेता कहते हैं कि बसपा शुरुआत से ही 2007 वाली सोशल इंजीनियरिंग के माध्यम से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थी। उसकी पहली जारी हुई सूची इस ओर इशारा भी कर रही है। वो कहते हैं सतीश चंद्र मिश्रा जुलाई से ही ब्राह्मण सम्मेलन पूरे प्रदेश में कर रहे हैं। मायावती लगातार सोशल इंजीनियरिंग पर न सिर्फ जोर दे रही है बल्कि अपने भतीजे आकाश आनंद की युवाओं के लिए तैयार की जाने वाली रणनीति पर बोल भी रही हैं और उसको अपना भी रही हैं।
क्यों बदले मायावती ने ज्यादातर उम्मीदवार
बसपा ने इस बार बड़ा फेरबदल करते हुए अपनी 53 सीटों में से मथुरा की माट और मुजफ्फरनगर की पुरकाजी सीट से ही अपने प्रत्याशी रिपीट किए हैं, बाकी सभी सीटों पर प्रत्याशी बदल दिए। इसके अलावा पहले चरण में पार्टी ने ओबीसी चेहरों में यादव, लोध, और जाट प्रत्याशियों को भी टिकट दिया है। पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि आने वाले विधानसभा के अन्य चरणों में भी प्रत्याशियों की सूची इसी आधार पर होगी।
सपा का तंज- उनके पास कोई बड़ा नाम नहीं बचा
हालांकि, पार्टी की पहली सूची में प्रत्याशियों को न रिपीट करने पर समाजवादी पार्टी सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे और प्रमुख प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि उनके पास अब कोई ऐसा बड़ा नाम और बड़ा चेहरा बचा ही नहीं है, जिसको वह रिपीट करें। कमजोर हो रही बसपा को छोड़कर ज्यादातर नेता अलग-अलग पार्टियों में जा चुके हैं, इसलिए बसपा अब अपना नया राग अलाप रही है।
चुनावी मैदान में होगी कांटे की टक्कर
वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी पहली लिस्ट में जातिगत समीकरणों को साधते हुए ही चुनावी मैदान में उतरी है। 107 लोगों की लिस्ट में 44 ओबीसी, 19 दलित, 18 ठाकुर समेत 10 ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं, जबकि बाकी प्रत्याशी अलग-अलग जातिगत समीकरणों को साधते हुए मैदान में हैं। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल की अब तक जारी हुई सूची में भी जातिगत समीकरणों को साध करके ही चुनावी मैदान में प्रत्याशियों को उतारा गया है। इसमें मुस्लिम और जाट को मजबूती के साथ साधा गया है। राजनैतिक विश्लेषक एसपी त्यागी कहते हैं कि जातिगत समीकरणों को साधने के मामले में बसपा की स्ट्रेटजी को कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।