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मायावती की चुप्पी का राज: अखिलेश के सपनों पर फिरा पानी और दौड़ रहा है बाबा का बुल्डोजर

सार

बुआ मायावती की चुप्पी बबुआ अखिलेश यादव के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के सपने पर करारा प्रहार करती नजर आ रही है। मतगणना पूरी होने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जो भी नतीजे आएंगे, उसकी समीक्षा जरूर करेंगे। सरकार न बना पाने के पीछे कम से कम उनकी करीब 50 ऐसी सीटें हैं, जहां प्रत्याशियों का चयन उन्हें परेशान करेगा।
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बसपा सुप्रीमो मायावती। - फोटो : ANI
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विस्तार
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चाचा शिवपाल यादव पार्टी का सपा में विलय कराकर साथ आए, लेकिन उनका सम्मान दिखावे भर का रहा। बुआ मायावती की चुप्पी का राज अब खुलकर सामने आ रहा है। बुआ की चुप्पी बबुआ अखिलेश यादव के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के सपने पर करारा प्रहार करती नजर आ रही है। चाहे फाजिलनगर से स्वामी प्रसाद मौर्य की करारी हार हो या फिर चुनौतियों से जूझते ओम प्रकाश राजभर। मायावती और शिवपाल यादव के कभी करीबी रहे प्रत्याशियों ने समाजवादी पार्टी को नाको चने चबवा दिए। दो की लड़ाई में तमाम सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी आसानी से कमल खिलाते नजर आ रहे हैं।

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2022 के नतीजे आ रहे हैं। शाम 5.30 बज रहे हैं। चुनाव आयोग से प्राप्त जानकारी के अनुसार भाजपा को 41.77 प्रतिशत वोट मिले हैं। समाजवादी पार्टी 31.94 प्रतिशत पर है। चौंकाने वाला आंकड़ा बसपा का है। बसपा के साथ बंधा रहने वाला 20 प्रतिशत के करीब का वोट इस बार खिसक गया है। 12.68 प्रतिशत वोट ही मिले हैं और अब अनुपात में कोई इजाफा नहीं होने वाला है। सीट के मामले में कांग्रेस प्रत्याशी दो सीट पर आगे हैं, जबकि बसपा का एक प्रत्याशी बढ़त बनाए है। राजनीतिक गलियारे में इसे बसपा प्रमुख मायावती की चुप्पी से जोड़ा जा रहा है। वैसे भी विधानसभा चुनाव में बसपा प्रमुख ने इस बार अपने चिर परिचित अंदाज से अलग चुनाव प्रचार किया। सत्तारूढ़ दल को जमकर कठघरे में खड़ा करने वाली मायावती करीब-करीब खामोश रही। समाजवादी पार्टी को बसपा का मुख्य प्रतिद्वंदी बताने से परहेज नहीं किया। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीतिक अभियानों को भी कठघरे में खड़ा करने से नहीं चूकी।

क्या 2022 में देश की उप राष्ट्रपति बन जाएंगी मायावती?
ऐसे गॉसिप पर खबर का आधार बनाना ठीक नहीं, लेकिन बनारस, जौनपुर, प्रयागराज, आजमगढ़ में भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच में यह खबर आम है। भले ही बसपा का वोट अपने पाले में खींचने की पर्दे के पीछे की चाल हो, लेकिन 2022 में मायावती को देश का उप राष्ट्रपति बनाने की चर्चा जोरों पर है। भाजपा के लिए कई राज्यों में प्रचार करने वाले संघ के एक प्रमुख नेता का भी कहना है कि प्रधानमंत्री का विजन हमेशा दलित, शोषित, पिछड़े समाज के हित में रहता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के 16 जिलों में जनसंपर्क प्रभारी का काम देख चुके सूत्र का कहना है कि आप नोट कर लीजिए, 2022 में इस तरह की पहल देखने को मिल सकती है। यह दावा छठे चरण का मतदान हो जाने के बाद का है।
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अभी यह नहीं कहा जा सकता कि इसमें कितनी गहराई, सच्चाई है। लेकिन बसपा प्रमुख मायावती के प्रत्याशी चयन को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकार संदेह भरी नजरों से देखते हैं। बसपा के एक प्रमुख नेता ने इस तरह के सवाल पर कहा कि कई सीटों पर कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में समर्पण कर दिया। उनकी जानकारी में है। सूत्र का कहना है कि यह राजनीति है। चुनावी राजनीति में जो हो रहा है, उसके बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता।

एक नजर इस पर भी डालिए
बसपा हर चुनाव में अपने प्रत्याशी बहुत पहले घोषित कर देती है। बाद में बदलाव की गुंजाइश कम रहती थी, लेकिन इस बार यह ट्रेंड भी बदल गया। बड़ी संख्या में प्रत्याशी बदले गए। विरोधी दलों के नेता इसे भाजपा की बसपा से साठगांठ बताते हैं। बसपा के नेता, मायावती के सचिवालय का कामकाज संभालने वाले मेवालाल गौतम इसे बकवास की संज्ञा देते हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थक इसे बदला बताते हैं। फाजिलनगर से स्वामी प्रसाद मौर्य प्रत्याशी थे। मौर्य से कुपित मायावती ने यहां से मो. इलियास को टिकट देकर स्वामी प्रसाद मौर्य के पांव में कील ठोंक दी। इलियास समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव के करीबियों में थे। समाजवादी पार्टी से टिकट की आस लगाए थे। नहीं मिला तो बसपा में चले गए। भाजपा के सुरेन्द्र कुशवाहा ने बहुत आसानी से यह बाजी जीत ली। जहूराबाद से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर चुनाव जीत रहे हैं।

ओम प्रकाश राजभर को हराने के लिए भाजपा ने कालीचरण को मैदान में उतारा था। तबतक राजभर को इसकी परवाह नहीं थी। लेकिन जैसे ही मैदान में शिवपाल सिंह यादव का आदर करने वाली शादाब फातिमा ने बसपा से पर्चा भरा, राजभर की परेशानी बढ़ गई। चुनाव जीतने के लिए खूब मेहनत करनी पड़ी। जौनपुर की सदर सीट से भाजपा के गिरीश यादव अपने प्रतिद्वंदी सपा के मो. अरशद खान से पीछे रहे। लेकिन बसपा ने मुकाबले को कड़ा बनाने के लिए सलीम खान को मैदान में उतार दिया। जौनपुर सदर भी उन सीटों में एक है, जहां कांग्रेस ने भी नदीम जावेद को उतार दिया। तीन अल्पसंख्यक पर गिरीश भारी जरूर पड़े लेकिन समाजवादी पार्टी के जनाधार वाली यह सीट इससे कांटे की लड़ाई में आ गई।

अखिलेश ने भी की है कई रणनीतिक गलतियां
मतगणना पूरी होने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जो भी नतीजे आएंगे, उसकी समीक्षा जरूर करेंगे। सरकार न बना पाने के पीछे कम से कम उनकी करीब 50 ऐसी सीटें हैं, जहां प्रत्याशियों का चयन उन्हें परेशान करेगा। अखिलेश यादव ने कहा था कि चाचा शिवपाल सिंह यादव का पूरा सम्मान किया जाएगा। शिवपाल ने अपनी पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय कर दिया और अकेले जसवंत नगर विधानसभा सीट से टिकट पा सके। चाचा को इसका मलाल है। जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में 50 से अधिक सीटों पर उनकी पार्टी के प्रत्याशियों ने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों के वोट का बंटवारा करके उन्हें हरा दिया था। शिवपाल के खेमे के 15-20 बहुत मजबूत उम्मीदवार थे, लेकिन टिकट नहीं पा सके।

राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी जयंत सिंह मथुरा की मांट सीट को अपने पास रखना चाहते थे। जाट बाहुल इस सीट पर 2017 में मोदी लहर के बाद भी उनका प्रत्याशी केवल 400 वोट से हारा था। अखिलेश की जिद पर उनके करीबी मित्र संजय लाठर को मांट से टिकट मिला, चुनाव लड़े और भारी अंतर से हार गए। अखिलेश यादव को इस समझौते में रालोद के प्रत्याशी को एमएलसी की सीट देने का वादा करना पड़ा। लेकिन इस बदलाव ने जाटों की राजनीति में जयंत को कमजोर कर दिया। बताते हैं जाटलैंड की एक दर्जन मजबूत सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार उतरे। राष्ट्रीय लोकदल को करीब आठ कमजोर सीटें मिली और इसका असर जाटों की राजनीति पर पड़ा। इस राजनीति ने पहले और दूसरे चरण में सपा-रालोद गठबंधन को काफी नुकसान पहुंचाया।

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