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यूपी में मुसलिमों को साधने में जुटी मायावती

Mon, 23 May 2016 05:13 AM IST
शादाब रिजवी/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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मायावती - फोटो : Getty
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बसपा सुप्रीमो मायावती अपनी सोशल इंजीनियरिंग में बदलाव की राह पर हैं। इस बार पार्टी ‘मिशन मुसलिम’ पर फोकस कर रही है। बसपा थिंक टैंक सपा की साइकिल से मुसलिमों को उतारकर हाथी की सवारी कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता। मुजफ्फरनगर दंगे से लेकर उत्तराखंड सरकार के नए सिरे से गठन को लेकर बसपा के कदम इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा से दूरी रखने और खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने का संदेश देने की बसपा भरसक कोशिश कर रही है। 
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वर्ष 2007 में बसपा दलित-ब्राह्मण की सोशल इंजीनियरिंग पर मैदान में उतरी और सरकार बनाई। हालांकि खासी तादाद में उसे मुसलिमों का भी साथ मिला था, लेकिन बाद में मुसलिमों ने बसपा सरकार में खुद को उपेक्षित महसूस किया। नतीजा यह रहा कि 2012 में मुसलिमों ने बसपा से पूरी तरह किनारा कर लिया और वह सपा की तरफ चले गए। सत्ता से बाहर बसपा का वोट प्रतिशत 25.91 फीसदी रह गया। यानी 4.52 फीसदी कम हो गया। 206 की जगह सीट भी 80  रह गई।  2014 के लोकसभा चुनाव में ब्राह्मणों ने भी भाजपा की तरफ रुख कर लिया। इसी वजह से ही बसपा ने रणनीति बदली और अपनी सोशल इंजीनियरिंग में बदलाव कर इस बार दलित-मुसलिम पर दाव खेलने फैसला लिया है।

पार्टी का मानना है कि मुसलिम कभी भाजपा के पाले में खड़ा नहीं होगा और दलित मुसलिम गठजोड़ फिर सत्ता की चाबी सौंप सकता है। इसके लिए पार्टी ने मुसलिम बाहुल्य खासकर वेस्ट यूपी में अपने विश्वास पात्र कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी को कमान सौंप रखी है। चर्चित मुसलिम चेहरे पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी को तव्वजो देकर उनके साथ बेटे इमरान याकूब को भी विधानसभा का टिकट दिया गया है। पार्टी ने अन्य मुसलिमों को भी बड़ी तादाद में टिकट बांटे हैं। 
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मुजफ्फरनगर दंगे का असर

बसपा प्रतीक
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद वेस्ट यूपी में मुसलिम और जाट बिरादरी का भाईचारा दरक गया। रालोद मुखिया अजित सिंह की तमाम कोशिश के बाद भी अभी खटास पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बसपा ने मुसलिमों से हमदर्दी दिखाने के लिए अपने जाट बिरादरी के नेताओं से भी लगभग किनारा किया। पूर्व मंत्री योगराज सिंह, जगत सिंह, चंद्रपाल सिंह आदि को इस बार टिकट नहीं दिए गए। सिर्फ छपरौली से राजबाला और मेरठ कैंट से सतेंद्र सोलंकी फिलहाल प्रत्याशी है। बसपा का यह कदम मुसलिमों को अपने पक्ष में करने के लिए धर्मनिरपेक्ष छवि पेश करने वाला माना जा रहा है।

उत्तराखंड में इसी माह हरीश रावत की सरकार को अपने विधायकों का समर्थन देना और अब हरिद्वार के जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए अपने घोषित प्रत्याशी को बदलकर कांग्रेस के पक्ष में अपने वोटरों से वोटिंग कराने को कहना भी सोची समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। खुद को धर्मनिरपेक्ष पेश कर मुसलिमों में भाजपा के खिलाफ खड़े होने का संदेश देना भी बसपा का मकसद होने से इनकार नहीं किया जा सकता। यूपी में चुनाव बाद त्रिशंकु विधानसभा बनने के हालत में सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन हासिल करने की फैल रही अटकलों को भी बसपा का क ांग्रेस को समर्थन देकर विराम लगने की कोशिश वाला कदम माना जा रहा है।
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