अयोध्या में राम मंदिर, बनारस में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और अब मथुरा में मंदिर के जीर्णोद्धार के बहाने भाजपा जहां हिन्दुत्व और कमंडल का राग छेड़ रही है, वहीं अखिलेश यादव ने भाजपा की दु:खती रग बड़े धीरे से दबा दी है। बनारस में प्रधानमंत्री ने बाबा विश्वनाथ के जलाभिषेक से लेकर पूजन, अर्चन तक उच्च मानदंडों का सहारा लिया। जवाब में जौनपुर से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जातिगत जनगणना का राग छेड़ दिया है।
वह बातचीत में भी साफ कहते हैं कि प्रदेश की दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग की जनता ने भाजपा के लिए घरों के दरवाजे बंद करने शुरू कर दिए हैं। यह भाजपा के रणनीतिकार भी भली भांति जानते हैं कि जाति का मुद्दा ही 2022 में अखिलेश की उम्मीद है।
वरिष्ठ पत्रकार श्याम नारायण पांडे कहते हैं कि अखिलेश यादव की जौनपुर में रथयात्रा ने बहुत भीड़ बटोर रखी थी। जहां से रथ गुजरा, कुछ किलोमीटर तक बस सपा के झंडे में भीड़ ही भीड़ रंगी थी। टीम अखिलेश ने समाजवादी युवजन सभा और पार्टी के कार्यकर्ताओं के जरिए भी गांव-गांव तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जाति, उनका खास जाति से लगाव जैसा प्रचार शुरू कर दिया है।
श्याम नारायण कहते हैं कि मेरे ख्याल में भाजपा को बहुत भ्रम में नहीं रहना चाहिए। उसे यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि कांग्रेस की प्रियंका गांधी के पीछे उमड़ने वाली भीड़ में एक बड़ा हिस्सा भाजपा को 2017 और 2019 में वोट देने वाले मतदाता हैं। सपा नेता संजय लाठर भी कहते हैं कि भाजपा के पास सांप्रदायिक राजनीति और हिन्दुत्व के सिवा है क्या? वह तो इसी को ब्रह्मास्त्र समझते हैं। लाठर कहते हैं कि भाजपा के लोग भूल जाते हैं कि उनके अलावा भी देश में तमाम लोग हिन्दू हैं। बहुसंख्यक आबादी हिन्दुओं की है और अब जनता भी सबकुछ समझने लगी है।
अमित शाह की रणनीति, जातिगत न हो चुनाव
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले महीने बनारस का दौरा किया था। तब उन्होंने 403 सीटों के विधानसभा प्रभारियों का सम्मेलन बुलाया था। संगठन की बैठक ली थी और कार्यकर्ताओं में जान फूंककर उन्हें उत्साह से भर दिया था। लेकिन इस दौरान अमित शाह ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को हिदायत दी थी कि किसी भी कीमत पर विधानसभा चुनाव-2022 जातिगत आधार (मुद्दे) की तरफ नहीं जाना चाहिए।
दरअसल अमित शाह चुनावी गणित के मामले में चाणक्य माने जाते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पिछड़े, अति पिछड़े वर्ग की तमाम जातियों को भाजपा के साथ जोड़ा था। राजभर, कोइरी, कुर्मी, पटेल, कुशवाहा, सैनी, जाट, गुर्जर सभी को पार्टी के साथ लाए थे। लेकिन 2017 के बाद से भाजपा का जातिगत गणित थोड़ा आगे पीछे हो रहा है। बसपा प्रमुख मायावती के सॉफ्ट कार्नर लेने से बसपा से भी कुछ जातियों का मोहभंग हो रहा है। राजनीति के पंडितों का मानना है कि बसपा छोड़ने वाली कुछ जातियों की पहली पसंद भी समाजवादी पार्टी बन रही है। इसका एक बड़ा संकेत दूसरे दलों को छोड़कर समाजवादी पार्टी में जाने वाले नेताओं की संख्या भी है। 2017 से पहले नेताओं की यह कतार भाजपा के पीछे खड़ी हो रही थी।
अखिलेश की सभाओं में उमड़ती भीड़ के मायने
अखिलेश यादव के करीबी और उनकी रथयात्रा के रणनीतिकारों में से एक संजय लाठर बताते हैं कि वह रथयात्रा का रूट और तैयारियां देखने के लिए निकलते हैं, लेकिन इस दौरान जिस तरह से भीड़ आ रही है, वह कुछ कह रही है। लाठर के मुताबिक चाहे बुंदेलखंड हो या पश्चिमी यूपी, गोरखपुर मंडल हो या कानपुर और मध्य यूपी का क्षेत्र, आपको हर जनसभा में भारी भीड़ देखने को मिलेगी। इसी के साथ वह तंज कसते हैं कि प्रदेश में डबल इंजन की सरकार है। सरकार के पास तमाम मशीनरी है जो भीड़ इकट्ठा करने में जुट जाती है। इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जनसभा में उतनी भीड़ नहीं आती। कुर्सियां खाली रह जा रही हैं। इसलिए समाजवादी पार्टी को अपने जनाधार के बारे में पता है।
अपने एजेंडे पर डेढ़ साल से काम कर रही है टीम अखिलेश
पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद यादव हमेशा कहते हैं कि जाति की राजनीति का मुकाबला धर्म की राजनीति से होगा तो सांप्रदायिक राजनीति करने वाले पिछड़ जाएंगे। क्योंकि लोगों की भावनाओं के ज्यादा करीब जाति है, धर्म नहीं। टीम अखिलेश अगड़ों को साधे रखने के लिए बिना जाति के मुद्दों को छेड़े इसकी राजनीति का दरवाजा खोलती जा रही है। इसके समानांतर भाजपा के रणनीतिकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विकास के मुद्दे को हवा देकर हिन्दुत्व की राजनीति को मुख्य प्राथमिकता में रखकर चल रहे हैं।
टीम अखिलेश इस एजेंडे पर पिछले डेढ़ साल से काम कर रही है। इसी को ध्यान में रखकर यूपी के छोटे-छोटे जाति, वर्ग या किसी तरह का संघर्ष का मोर्चा बनाकर काम कर रहे कई दर्जन लोगों को भी समाजवादी पार्टी से जोड़ा है। अखिलेश यादव ने करीब एक दर्जन दलों के साथ तालमेल को आगे बढ़ाने की जमीन तैयार की है। टीम अखिलेश को भरोसा है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने तक गांव, खेत, खलिहान से लेकर नगर महानगर तक उनके कार्यकर्ता अपना संदेश देने में सफल हो जाएंगे।