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उत्तर प्रदेश चुनाव: जनता के मूड और एकमुश्त मतदान के ट्रेंड की परंपरा दिखी तो हो सकता है 'बदलाव'

सार

1990 के दशक से देश ने अनेक दलों के गठबंधन की खिचड़ी सरकारें देखीं। केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजयेपी, एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल ने सहयोगी दलों के गठबंधन से खिचड़ी सरकारें बनाईं और चलाईं। लेकिन इसमें उन्हें कई बार सहयोगी दलों के दबाव के सामने झुकना पड़ा और कई सरकारों को बलिदान होना पड़ा...
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : Amar Ujala (File Photo)
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विस्तार
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हाल के चुनावों को ध्यान से देखें तो एक बात स्पष्ट ढंग से दिखाई पड़ती है कि अब मतदाता ‘निर्णायक’ वोट करना पसंद कर रहे हैं। वे या तो सत्ता में बदलाव के लिए सरकारों के विरुद्ध एकमुश्त वोट दे रहे हैं, या सत्ता बरकरार रखने के लिए सत्तारूढ़ दल को अपना भरपूर समर्थन दे रहे हैं। यह ट्रेंड 2014 और 2019 के आम चुनावों में भी दिखाई प़ड़ा और पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यदि उत्तर प्रदेश में भी इसी तर्ज पर बदलाव के लिए मतदान हुआ, तो राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है।

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इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल के चुनाव में देखा गया, जहां जनता ने एकमुश्त ममता बनर्जी के पक्ष में मतदान किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह के साथ भाजपा की पूरी फौज ने पश्चिम बंगाल को चुनावी रैलियों से पाट दिया, अमित शाह ने इस चुनाव में भाजपा के दो सौ सीटों के पार जाने का दावा भी किया, लेकिन इसके बाद भी जनता ने तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मतदान कर ममता बनर्जी को पूर्व के चुनाव से ज्यादा सीटों के साथ सत्ता सौंप दी।

इसी तरह का ट्रेंड दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिला। आम आदमी पार्टी को दिल्ली की जनता ने विधानसभा की 70 सीटों में से 2015 में 67 तो 2020 में 62 सीटें देकर जबरदस्त समर्थन दिया। भाजपा का पूरा प्रचार अभियान जनता के मूड के सामने फीका पड़ गया और भाजपा दहाई के अंक तक नहीं पहुंच सकी। उत्तर प्रदेश की जनता भी एकमुश्त समर्थन देने के मामले में पीछे नहीं रही। 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव को इसी प्रकार एकमुश्त समर्थन मिला। इसके बाद 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में जनता ने एकमुश्त भाजपा को समर्थन दिया और कई दलों को शून्य के अंक पर समेटकर रख दिया।   

क्या यही रहेगा ट्रेंड

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आईपी सिंह ने अमर उजाला से कहा कि प्रदेश में बदलाव की एक बयार चल रही है। इसे अखिलेश यादव की रैलियों, समाजवादी पार्टी की साइकिल यात्राओं और जनसभाओं में उमड़ रही भारी भीड़ से समझा और महसूस किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की रैलियों के लिए भाजपा को लोगों की भीड़ जुटाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है, वहीं समाजवादी पार्टी की रैलियों में लाखों लोगों की स्वतः स्फूर्त भीड़ उमड़ रही है।

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आईपी सिंह ने दावा किया कि बहुजन समाज पार्टी और भाजपा के नेताओं में समाजवादी पार्टी में शामिल होने के लिए लगी होड़ यह बताती है कि जनता बदलाव के मूड से गुजर रही है और ये नेता इस बदलाव को महसूस कर समाजवादी पार्टी से जुड़ना चाहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि योगी आदित्यनाथ सरकार के पिछले पांच साल के कार्यकाल में हुई सांप्रदायिक राजनीति, पेट्रोल-डीजल की महंगाई और भाजपा नेताओं के अहंकारी बयानों के कारण जनता अब सत्ता में बदलाव चाहती है और यह बदलाव मतदान के दौरान दिखाई पड़ेगा।      

यूपी-बंगाल नहीं

हालांकि, भाजपा इस बात से इनकार करती है। उसका कहना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति पश्चिम बंगाल की राजनीति से बिल्कुल अलग है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में वामदलों और कांग्रेस ने भाजपा को हराने के लिए अपनी कुर्बानी दे दी और ममता बनर्जी को आगे रखने के लिए स्वयं को पीछे कर लिया। इसके बाद भी भाजपा वहां अपनी बढ़त बनाने में कामयाब रही।   

भाजपा नेता अमित मालवीय ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में पश्चिम बंगाल जैसा विभाजन देखने की उम्मीद करने वालों को भारी निराशा हाथ लगेगी, क्योंकि यूपी की सियासत बिल्कुल अलग है। यहां सपा-बसपा और सपा-कांग्रेस का गठबंधन बुरी तरह असफल हुआ है क्योंकि जनता इनके नेताओं की ‘असलियत’ समझती है। उनका दावा है कि प्रदेश की जनता एक बार फिर विकास के नाम पर मतदान करेगी और भाजपा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी।

क्यों आया था यह ट्रेंड

1990 के दशक से देश ने अनेक दलों के गठबंधन की खिचड़ी सरकारें देखीं। केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजयेपी, एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल ने सहयोगी दलों के गठबंधन से खिचड़ी सरकारें बनाईं और चलाईं। लेकिन इसमें उन्हें कई बार सहयोगी दलों के दबाव के सामने झुकना पड़ा और कई सरकारों को बलिदान होना पड़ा। मनमोहन सिंह ने भी यूपीए के नेतृत्व में गठबंधन सरकार चलाई, लेकिन अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में होने के कारण सरकार को ज्यादा दबाव नहीं झेलना पड़ा।

तकनीकी तौर पर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार भी एनडीए की सरकार है, जिसमें भाजपा के साथ अन्य दल भी शामिल हैं। लेकिन 2014 और 2019 में अकेले दम पर पूर्ण बहुमत होने के कारण सरकार को सहयोगी दलों के सामने झुकना नहीं पड़ा और वह अपने एजेंडे पर आगे बढ़ती रही। जानकारों का मानना है कि यदि भाजपा अकेले दम पर 272 के जादुई आंकड़े के पार न रही होती तो उसे काफी कठिन स्थिति का सामना करना पड़ता। शिवसेना, लोजपा और हाल ही में कृषि कानूनों के मुद्दे पर जिस तरह अकाली दल ने सरकार से पल्ला झाड़ा है, शायद सरकार के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो गया होता।

यही हाल उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी हुआ जहां सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा ने लंबे समय तक अलग-अलग गठबंधन में सरकारें बनाईं, चलाईं और गिराईं। मायावती, मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह इसी दौर में प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हुए। लेकिन कहा जाता है कि इन सरकारों में सहयोगी दलों के अनावश्यक दबावों के सामने सरकारों को झुकता देख जनता के मन में गठबंधन सरकारों से मोहभंग हुआ और लोग एकमुश्त वोट देने और बदलाव करने के लिए प्रेरित हुए।

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