समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इस समय दोहरे मोर्च पर युद्ध लड़ रहे हैं। वह एक तरफ मोदी-अमित शाह और भाजपा की भारी-भरकम टीम से अकेले लड़कर अपनी पार्टी को जीत दिलाने की कोशिश कर रहे हैं, तो साथ ही साथ स्वयं अपनी और अपनी पार्टी सपा की नई छवि गढ़ने की कोशिश भी कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी पर सबसे बड़ा आरोप परिवारवाद, जातिवाद और मुस्लिमों के तुष्टीकरण का लगता रहा है। लेकिन समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों और स्टार प्रचारकों की लिस्ट को ध्यान से देखें तो यह साफ पता चलता है कि अखिलेश समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। वे इस चुनाव के जरिए एक नई सपा खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें समाजवाद की असली झलक दिखाई पड़ रही है।
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने अमर उजाला से कहा कि किसी भी बड़े नेता के बेटे-बेटियों को राजनीति में जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। उन्हें नेता पुत्र होने का कुछ फायदा मिलता है तो कुछ नुकसान भी उठाना पड़ता है। उन्हें एक स्थापित पार्टी, निष्ठावान कार्यकर्ता और एक अच्छा संगठन मिलता है, जिसका उन्हें फायदा होता है, लेकिन अपने पूर्वजों के किए गए कामों और उनकी छवि से उबरना इन नेता पुत्रों के लिए बड़ी चुनौती होता है। राहुल गांधी व्यक्तिगत रूप से बेहद अच्छे होते हुए भी अभी तक गांधी परिवार का होने की कीमत चुका रहे हैं।
बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के पोस्टरों पर केवल तेजस्वी यादव की ही फोटो दिखाई पड़ी। इससे यह संकेत गया कि वह लालू प्रसाद यादव की छवि से अलग हटकर अपनी एक नई लकीर खींचना चाहते हैं। विपक्ष ने इस पर हमला भी किया लेकिन वे डिगे नहीं और अपनी अलग लाइन बनाते नजर आए। पार्टी के टिकट बंटवारे में भी उन्होंने पूरी तरह से पारदर्शिता रखी और समाज के सभी वर्गों को भागीदारी देना सुनिश्चित किया। केवल इसी सूझबूझ का परिणाम था कि नए नवेले तेजस्वी यादव ने राष्ट्रीय जनता दल को दिग्गज पार्टियों भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड से आगे खड़ी करने में सफलता पाई।
तेजस्वी यादव ने अपना विवाह करते समय न केवल जातिवाद की दीवार तोड़ी, बल्कि धर्म से भी परे जाते हुए एक ईसाई परिवार की लड़की को अपनाकर यह संकेत देने की सफल कोशिश की कि वे जातिवाद और परिवारवाद से ऊपर उठकर सोचने और कार्य करने की क्षमता रखते हैं। उनकी इसी सोच ने युवाओं के बीच उन्हें बेहद लोकप्रिय बना दिया।
अखिलेश यादव भी ने विधानसभा चुनाव 2017 के दौरान इसी तरह समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव की छवि से बाहर निकालने की कोशिश की थी, लेकिन पूरी कोशिश के बाद भी वे इसमें सफल नहीं हो पाए। पार्टी और परिवार में कलह की उनकी कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव के पीछे रह जाने और शिवपाल यादव जैसे नेताओं के नेपथ्य में चले जाने के बाद अखिलेश यादव की वही कोशिश अब सफल होती दिखाई पड़ रही है। टिकट बंटवारे में भी समाज के सभी वर्गों को उचित भागीदारी देकर वे बेहतर संदेश दे रहे हैं।
मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी पर बड़ा आरोप अपराधियों के संरक्षण का भी लगा था। नई लिस्ट में अखिलेश यादव ने नाहिद हसन जैसे कुछ ऐसे उम्मीदवारों पर दांव लगाया है, जिससे उनकी कोशिशों पर सवालिया निशान खड़े होते हैं। इसे केवल दूसरी पार्टियों के आरोप कहकर खारिज कर देना अखिलेश यादव के लिए आसान नहीं होगा। उन्हें इस आरोप से भी ऊपर उठने की कोशिश करनी पड़ेगी, तभी सपा नए जमाने के युवाओं की उम्मीदों पर खरी उतर सकेगी।