इलाहाबाद में कुल नौ विधानसभा सीटें हैं। इनमें से भाजपा ने सात बाहरी उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। राजमणि कोल पहले भाजपा में थे, बाद में समाजवादी पार्टी में चले गए थे। अब भाजपा में लौट आए हैं। कोरांव से चुनाव लड़ रहे हैं। केवल दो पुराने भाजपा नेताओं को ही प्रत्याशी बनाया गया है। इसी तरह से 27 जनवरी को ही बनारस में भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के विरोध में भाजपा नेताओं ने ही नारे लगाए। यहां तक भाजपा मुख्यालय में भी पहली बार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ नारे लगे हैं। माना जा रहा है कि पार्टी के ही नेता राज्य में 403 विधानसभा सीट में से 50 से अधिक बाहरी उम्मीदवारों को लेकर सख्त नाराज हैं।
इलाहाबाद में आरएसएस से जुड़े एक प्रमुख सूत्र को यह काफी अखर रहा है। इसी तरह से बनारस में श्यामदेव राय चौधरी को टिकट न मिलना लोगों को रास नहीं आ रहा है। जौनपुर में भी यही स्थिति है। सैदपुर से प्रत्याशी बनाए गए विद्यासागर सोनकर भी बहुत खुश नहीं हैं। वह मछलीशहर विधानसभा सीट से चुनाव लडऩा चाहते थे। केन्द्र सरकार के चार मंत्रियों और पूर्वांचल के भाजपा से जुड़े एक बड़े सांसद को भी टिकट वितरण हजम नहीं हो रहा है। वहीं वरुण गांधी न तो स्टार प्रचारक हैं और न ही पार्टी उनका बहुत इस्तेमाल करना चाहती है। सब मिलाकर भाजपा में भितरघात बढ़ने की आशंका जोर पकडऩे लगी है। यूपी में पार्टी के एक प्रवक्ता ने भी दबी जुबान से माना कि कार्यकर्ताओं में थोड़ा नाराजगी है, लेकिन वह समय के साथ ठीक हो जाएगी।
दल बदलू को मिला सम्मान
पार्टी नेताओं का कहना है कि श्याम देव राय चौधरी को टिकट नहीं मिला जबकि वह लगातार विधायक रहे हैं। वहीं बसपा से भाजपा में आए स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके बेटे को टिकट मिल गया। भाजपा ने अपनी पहली ही सूची में 25 बाहर से प्रत्याशियों को टिकट दिया था। रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस से आई और उन्हें टिकट मिल गया। इसी तरह से लखनऊ उत्तर, रनियां, बिल्हौर में दूसरे दल से आए प्रत्याशी मैदान में हैं। सहारनपुर क्षेत्र भी अछूता नहीं है। रापुर मनिहारन से स्व. रामस्वरुप निगम के बेटे देवेन्द्र निगम को प्रत्याशी बनाना पार्टी के ही लोगों को खल रहा है।