सैदनपुर के राम निहोर मटर और सब्जियों से अच्छी कमाई कर लेते थे, लेकिन इस बार जितनी कड़ाके की ठंड है, उतना ही ठंडा हाथ हो रहा है। कारण केवल एक है। गौवंश आते हैं और फसल बरबाद कर रहे हैं। राम निहोर बताते हैं कि सड़कों पर भी घूमते आवारा पशुओं की गाड़ियों से टक्कर हो जा रही है और दुर्घटना का कारण बन रहे हैं। जौनपुर से सुल्तानपुर रोड पर कई गांव हैं। मड़ई में अलाव जलाकर ठंड से बचने में लगे दिनेश, अजीत और किशोर को भी खुद से ज्यादा चिंता खेत में बोए गेहूं की है। बताते हैं पिछले साल तो गौवंश का झुंड आता था और गेहूं की फली को ही चर जाता था।
किसानों की सुनिए मुख्यमंत्री जी। किशोर बताते हैं कि राज्य सरकार ने ब्लाक के स्तर पर आवारा घूमने वाले गौवंश के लिए कुछ इंतजाम किया है। टिन शेड का घेरा बनाकर वहां कुछ गाय, बछड़ों के रखने का इंतजाम हुआ है। सरकार ने इसके लिए प्रतिदिन, प्रति गाय 30 रुपये देने की व्यवस्था की है, लेकिन 30 रुपये में बाजार भाव के हिसाब से अधिकतम तीन किलो भूसा ही आ सकता है। जबकि एक गाय या जानवर को दिनभर में चार से पांच किलो भूसा की जरूरत होती है।
इंटर कालेज के अध्यापक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि छुट्टा गौवंश किसान का पशुधन और खेती दोनों का गणित बिगाड़ रहे हैं। हालांकि कई लोगों का मानना है कि योगी सरकार ने धार्मिक रूप से यह काम सही किया है। गाय और गौवंश पूजे जाते हैं। इनका वध नहीं किया जाता। अधिकांश गौवंश बिहार के रास्ते, बंगाल और नेपाल चले जाते थे। लेकिन बदले समय में अब बैलों की उपयोगिता पूरी तरह से घट गई है। देशी गाय ब्याने के बाद केवल पांच-छह महीने दूध देती है। जर्सी या अन्य गायों के बछड़े का खेती के काम में कोई उपयोग नहीं हो पाता। गांवों में चरागाह रह नहीं गए। इस स्थिति में सबसे बड़ी समस्या गाय और गौवंश पालना ही है।
किसानों को दूसरी मार भी पड़ रही है। बताते हैं पहले जर्सी गायों के अच्छे दाम मिल जाते थे। वह जर्सी गाय की बछिया पालते थे और गाय बनने के समय में ऊंची कीमत में बेच देते थे। इससे मिले रुपये से खेती, खलिहानी का बड़ा काम हो जाता था। शादी, ब्याह के काम होते थे। लेकिन अब गायों के रेट काफी कम हो गए हैं। इसके उलट भैंस के रेट बढ़ गए हैं। इससे गांव में जहां पशु पालन मंहगा हो रहा है, वहीं गांव में दूध का उत्पादन खराब हो रहा है। तमाम घरों में दूध है ही नहीं। किसान योगेश नारायण कहते हैं कि जब बच्चों को दूध, दही, मक्खन, घी नहीं मिलेगा तो उनका अच्छा पोषण कैसे होगा?
किसान के बीच में एक सवाल उछालिए कि अब तो आने वाले समय में गाय केवल बछिया ही जनेगी। वैज्ञानिकों ने ऐसा सीमन तैयार कर लिया है। इस सवाल पर किसान अनिल कुमार ही सवाल खड़ा कर देते हैं। अनिल कुमार सिंह का कहना है कि मुझे अभी यह योजना समझ में कम आ रही है। अनिल कुमार का कहना है कि इस तरह के सीमन की सरकारी कीमत 1500 रुपये सुनने में आ रही है। जबकि औसतन कृत्रिम गर्भाधान का तरीका अपनाने पर औसतन दो-तीन बार सीमन चढ़वाने की जरूरत पड़ती है। इस तरह से 3000 रुपये का किसानों के ऊपर आने वाला यह खर्च नया बोझ ही होगा। दूसरे इस तरह के बार-बार कृत्रिम गर्भाधान के तरीके अपनाने पर गाय औसत समय से पहले ही गर्भधारण करने के अयोग्य हो जा रही हैं।