यूपी विधानसभा चुनाव में अब छह महीने से भी कम का समय रह गया है। इससे पहले योगी आदित्यनाथ ने अपना मंत्रिमंडल का विस्तार कर सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है। उन्होंने सत्ता में उन जातियों की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की है, जो अब तक सरकार में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं पा सके थे या किसी कारण सरकार से नाराज चल रहे थे। विश्लेषकों के मुताबिक, आज के यूपी मंत्रिमंडल के विस्तार का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अब किसी एक जाति-धर्म के आधार पर राजनीति की गाड़ी ज्यादा आगे तक नहीं खींची जा सकती। जिस दल को सत्ता में आना है उसे समाज के सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करनी होगी।
1984 में अपनी स्थापना के बाद बहुजन समाज पार्टी ने दलित समुदाय की राजनीति शुरू की और तेजी से उसका राजनीतिक ग्राफ आगे बढ़ा, लेकिन दलित राजनीति की पूरी कोशिश के बाद भी बसपा एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाई। पार्टी सुप्रीमो मायावती को इस रणनीतिक गलती का एहसास हुआ और उन्होंने सामाजिक समीकरणों को साधने का फॉर्मूला अपनाया। 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दलितों के साथ-साथ ब्राह्मणों को साथ लेने की कोशिश की और यूपी में लंबे समय बाद कोई दल अपनी ताकत से सरकार बनाने में सफल हुआ।
लगभग यही कहानी समाजवादी पार्टी की भी रही है। मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा ने यादवों की अगुवाई में पिछड़े वर्गों की राजनीति शुरू की और पार्टी का ग्राफ आगे बढ़ा, लेकिन कुछ ही समय बाद समाजवादी पार्टी को भी इस बात का एहसास हुआ कि केवल एक वर्ग विशेष की राजनीति करके एक सीमा से आगे बढ़ना मुश्किल है। पार्टी ने 2007 में बसपा के फॉर्मूले का असर भी देख लिया था। सपा ने 2012 में इन्हीं सामाजिक समीकरणों को ज्यादा तेजी और मजबूती के साथ अपनाया और पार्टी अकेले दम पर सत्ता में आने में कामयाब रही।
राजनीति की यह सच्चाई केवल उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। आम चुनावों में भाजपा को 2014 और 2019 में मिली शानदार सफलता के पीछे भी पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग को ही सबसे प्रमुख कारण माना जाता है।
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि भारत के लोकतंत्र के लिए यह बेहद सुखद संकेत है। सभी राजनीतिक दलों को इस बात का एहसास हो रहा है कि यदि वे केवल एक जाति-वर्ग की राजनीति करेंगे तो एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाएंगे। यदि सत्ता तक पहुंचना है तो उन्हें सभी सामाजिक समीकरणों को साधना होगा। मुस्लिमों के विरोध को खतरनाक स्तर तक मुद्दा बनाकर आगे बढ़ी शिवसेना को यदि आज मुसलमानों को साधते हुए देखा जा रहा है तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भारत का लोकतंत्र उन्हें सबको साधने के लिए मजबूर कर रहा है।
इसके पहले देश ने देखा है कि किस प्रकार एक जाति-धर्म की राजनीति से देश का राजनीतिक माहौल बेहद खराब हो गया था और समाज की एक जाति का दूसरे के साथ वैमनस्य बढ़ता जा रहा था। हालांकि, राजनीतिक दलों को इसका नुकसान भी भुगतना पड़ा जब दो राष्ट्रीय दलों के नेताओं के जोरशोर से गठबंधन को स्थानीय स्तर पर जनता ने स्वीकार नहीं किया और उन्हें अपने ही किए का नुकसान भुगतना पड़ा।
सुनील पांडेय ने कहा कि सामाजिक समीकरणों को साधने का दबाव सबसे ज्यादा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयानों में देखा जा सकता है। यदि मोहन भागवत को अब यह समझ आ रहा है कि मुसलमानों के बिना भारत अधूरा है, और भाजपा मुसलमानों का वोट लेने के लिए रणनीतिक स्तर पर तैयारी कर रही है तो इसका श्रेय हमारी संस्कृति को ही दिया जा सकता है जिसमें सबको साथ लेने की संस्कृति अब राजनीतिक दलों की मजबूरी भी बनती जा रही है।
गठबंधन सरकारों के दौर में भी यही सामाजिक समीकरण सधते दिखाई पड़ रहे थे जहां विभिन्न राजनीतिक दल मिलकर सत्ता चलाने की कोशिश करते थे, लेकिन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के कारण यह प्रयोग बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाया। अब वही कार्य बड़े दलों ने अपने स्तर पर करना शुरू कर दिया है जिसका सकारात्मक परिणाम भी दिखाई पड़ रहा है।
समाजवादी पार्टी नेता राजेंद्र चौधरी ने अमर उजाला से बातचीत के दौरान योगी आदित्यनाथ सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश नहीं कर रही है, बल्कि वह अपनी नाकामियों को छिपाने की कोशिश कर रही है। यदि उसे सभी समाज के वर्गों को साथ लेने का संदेश देना था, तो यह संदेश बहुत पहले दिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि इस बदलाव से कोई लाभ नहीं होगा।
लेकिन क्या अब सामाजिक समीकरणों को साधने की ही राजनीति होगी? राजेंद्र चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र में सभी राजनीतिक दल सबको साथ लेकर चलें तो इससे बेहतर संकेत और कुछ नहीं हो सकता। इससे देश का आंतरिक ढांचा और मजबूत होगा। लेकिन यह बदलाव दिखावे के लिए नहीं किया जाना चाहिए।