गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) ट्रिब्यूनल ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और उसके सहयोगियों पर प्रतिबंध को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा ने मंगलवार को यह फैसला सुनाया। इससे पहले केंद्र सरकार ने पीएफआई और उसके सहयोगियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। आदेश पारित करने के बाद UAPA ट्रिब्यूनल ने निर्णय को MHA के पास भेज दिया है।
इस्लामिक स्टेट (आईएस) जैसे वैश्विक आतंकवादी संगठनों से कथित रूप से संबंध होने और देश में सांप्रदायिक नफरत फैलाने के आरोप में बीते साल 27 सितंबर को केंद्र सरकार ने पीएफआई पर पांच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया था। मामले से जुड़े वकीलों ने पुष्टि की कि अधिकरण की अगुवाई कर रहे दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा ने अपने फैसले में संगठन पर प्रतिबंध की पुष्टि की है।
पीएफआई के सहयोगी या संबंद्ध संगठनों पर रोक
- रेहाब इंडिया फाउंडेशन (आरआईएफ)
- कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई)
- ऑल इंडिया इमाम्स काउंसिल (एआईआईसी)
- नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ह्यमून राइट्स ऑर्गनाइजेशन (एनसीएचआरओ)
- नेशनल वूमंस फ्रंट
- जूनियर फ्रंट
- इम्पावर इंडिया फाइंडेशन
- रेहाब फाउंडेशन, केरल
नेशनल वूमंस फ्रंट की पैरवी कर रहे वकील कार्तिक वेणु ने कहा कि अधिकरण ने सभी आठ संगठनों पर प्रतिबंध की पुष्टि की है। केंद्र सरकार ने पिछले साल 27 सितंबर को जारी अधिसूचना में कहा था कि देश में सांप्रदायिक नफरत फैलाने के आरोप के चलते केंद्र सरकार का दृढ़ता से यह मानना है कि पीएफआई की गतिविधियों को देखते हुए उसे और उसके सहयोगियों या मोर्चों को तत्काल प्रभाव से गैरकानूनी संगठन घोषित करना जरूरी है। ऐसे में संबंधित अधिनियम की धारा-3 की उपधारा (3) में दिए गए अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इसे गैर-कानूनी घोषित किया जाता है। पीएफआई से कथित रूप से जुड़े 150 से अधिक लोगों को पिछले साल सितंबर में सात राज्यों में छापेमारी के दौरान हिरासत में लिया गया था या गिरफ्तार किया गया था।