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बेरोजगारी ने तोड़ा 'यंग इंडिया' का भरोसा, 'जनसांख्यिकीय लाभांश' बना आपदा, कैसे देंगे आर्थिक मोर्चे पर चीन को टक्कर

Tue, 01 Sep 2020 07:45 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सरकारी नीतियां हमारे 'जनसांख्यिकीय लाभांश' को 'जनसांख्यिकीय आपदा' बनाने पर तुली है। जिन युवाओं का टेस्ट पास हो गया है, उन्हें ज्वाइनिंग नहीं मिल रही। सरकारी नौकरियों के अवसर खत्म किए जा रहे हैं। अनेक विभागों में सेवानिवृत्त लोगों को अनुबंध पर नौकरी मिल रही हैं...
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Unemployment - फोटो : PTI (for Reference)
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विस्तार
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यह सही है कि भारत में यूथ वर्क फोर्स का बड़ा आंकड़ा है। करीब 65 फीसदी आबादी ऐसी है, जिसकी औसत आयु 35 या उससे कम है। दूसरे देश इस आंकड़े से खासे प्रभावित हैं। लेकिन बेरोजगारी ने यंग इंडिया का भरोसा तोड़ दिया है। देश के युवाओं को न प्राइवेट क्षेत्र में रोजगार मिल रहा है और न ही सरकारी। युवाओं के हितों को लेकर लगातार आवाज बुलंद करने वाले युवा हल्लाबोल के संस्थापक अनुपम यहीं पर नहीं रूके, उन्होंने आगे कहा, सरकार जब युवा आबादी को रोजगार नहीं देगी, तो यह बोझ बन जाएगी।

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सरकारी नीतियां हमारे 'जनसांख्यिकीय लाभांश' को 'जनसांख्यिकीय आपदा' बनाने पर तुली है। जिन युवाओं का टेस्ट पास हो गया है, उन्हें ज्वाइनिंग नहीं मिल रही। सरकारी नौकरियों के अवसर खत्म किए जा रहे हैं। अनेक विभागों में सेवानिवृत्त लोगों को अनुबंध पर नौकरी मिल रही हैं, लेकिन कल के भविष्य का तगमा गले में लटका कर घूम रहे युवाओं को नौकरी से दूर रखा जा रहा है।

पिछले दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था पर निगरानी रखने वाली संस्था सीएमआईई ने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की थी। इसमें बताया गया कि 28 साल से लेकर 39 साल तक की उम्र वाले लोगों की कुल कार्यबल में हिस्सेदारी घट रही है। इस आयु वाले वर्ग की कुल रोजगार में हिस्सेदारी का ग्राफ देखें तो 2019-20 में वह 34 फीसदी रह गया है। इससे दो साल पीछे जाकर देखें तो वह 37 फीसदी था। कोरोना का लॉकडाउन, युवाओं के लिए अधिक नुकसानदेह साबित हो रहा है।
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महामारी की यह आपदा युवाओं को शारीरिक तौर पर भले ही परेशान न कर रही हो, मगर मानसिक रूप से उन्हें बड़ी पीड़ा पहुंचा रही है। एसएससी जीडी वाले आवेदक लंबे समय से ज्वाइनिंग के इंतजार में बैठे हैं। बहुत से युवाओं का तो मेडिकल भी हो चुका है, बावजूद इसके उनकी ज्वाइनिंग नहीं हो पा रही है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगले पांच साल के दौरान रोजगार में 20-24 वर्ष की आयु वाले समूह की हिस्सेदारी कुल लोगों का 8.5 फीसदी पर जा रही है।

तीन साल पहले की बात करें तो इस आयु वर्ग वाले युवाओं की रोजगार में हिस्सेदारी 9.1 फीसदी रही है। उससे अगले साल यानी 2018-19 में यह हिस्सेदारी घटकर 8.6 फीसदी रह गई। पिछले साल यह हिस्सेदारी 8.5 फीसदी पर पहुंच गई।

अनुपम बताते हैं कि भाजपा ने 2014 में यूपीए सरकार की यह कह कर आलोचना की थी कि मनमोहन सिंह सरकार जॉब लैस नीति पर काम करती रही है। इसी के चलते भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में हर साल दो करोड़ नौकरी देने का वादा किया था। 2018 में एक रिपोर्ट आई कि देश में बेरोजगारी ने 45 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। भर्ती के लिए बने आयोगों व बोर्डों में सालाना पदों की संख्या कम होती चली गई।

एसएससी, रेल और यूपीएससी के पद कम कर दिए गए। कोविड-19 में बेरोजगारी ने और ज्यादा आपदा ला दी। इस महामारी में तो मांग और सप्लाई, दोनों ही धरातल पर आ गई। रेलवे जैसे विभाग, जिसमें सबसे ज्यादा नौकरियां मिलती थीं, अब युवाओं को कथित तौर पर ठगने लगे हैं। जिन पदों का विज्ञापन निकला, वे पद ही खत्म हो रहे हैं।

पिछले साल के लोकसभा चुनाव से पहले कहा गया था कि रेलवे में दो साल के अंदर चार लाख लोगों को नौकरी मिलेंगी। एनटीपीसी आरआरबी के 35 हजार पद और ग्रुप डी के एक लाख पदों की अधिसूचना जारी हुई। आवेदकों ने पांच-पांच सौ रुपये का फार्म भर दिया। दो करोड़ 42 लाख आवेदक नौकरी की लाइन में खड़े हो गए।

फीस को देखें तो वह एक हजार करोड़ से ज्यादा थी। उस पर अभी तक कितना ब्याज मिला होगा, यह अंदाजा लगा सकते हैं।अब कुछ नहीं पता कि भर्ती होगी या नहीं। युवा इधर से उधर चप्पलें तोड़ते हुए घूम रहे हैं।

एसएससी और रेलवे भर्ती में अन्याय के खिलाफ होगा 'युवा हल्ला बोल'

नौकरियों की आस में सालों से घर बैठे देश के बेरोज़गार युवा अब भारी आक्रोश में हैं। अनुपम बताते हैं कि ट्विटर पर चले अभियान ने इस बात की पुष्टि कर दी है। 'युवा हल्ला बोल' के तहत  #SpeakUpForSSCRailwayStudents हैशटैग भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में नंबर 1 पर ट्रेंड करता रहा। एक दिन में 25 लाख से ज़्यादा ट्वीट भारत के बेरोजगार युवाओं की पीड़ा को बयान कर रहे हैं।

एसएससी और रेलवे में हो रही ढिलाई के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए युवा आगे आ रहे हैं। एक तरफ सरकारी नौकरियों में भर्ती परीक्षा को सरकार खुद गंभीरता से नहीं लेती तो दूसरी ओर करोड़ों छात्रों की उम्मीद व बेहतर भविष्य का सपना इन्हीं भर्तियों पर टिका होता है। एसएससी के द्वारा कराई जा रही सीजीएल 2018 की परीक्षा 850 दिन से और रेलवे की परीक्षा 18 महीने से अटकी पड़ी है।

इन परीक्षाओं के अभ्यर्थियों ने सरकार के खिलाफ एक सितंबर को मोर्चा खोल दिया है। अनुपम ने कहा कि भर्ती प्रक्रियायों में सालों साल होने वाली देरी से निपटने के लिए 'युवा हल्ला बोल' ने सरकार को 'मॉडल एग्जाम कोड' का प्रस्ताव भी दे रखा है। मॉडल कोड के तहत किसी भी भर्ती में विज्ञापन से लेकर नियुक्ति तक की पूरी प्रक्रिया 9 महीने के अंदर पूरी होने का प्रावधान है।

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