उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शनिवार को कहा कि राजनीतिक लाभ उठाने के लिए सदन की कार्यवाही के दौरान अशोभनीय व्यवहार लोकतंत्र की भावना को आघात पहुंचाता है। इस दौरान उन्होंने इस बात पर भी दुख जताया कि आजकल सदस्य दूसरों के विचारों को सुनने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं।
ओरिएंटेशन कार्यक्रम में नए राज्यसभा सदस्यों को दी सलाह
राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने एक ओरिएंटेशन कार्यक्रम में नए राज्यसभा सदस्यों से कहा- आप दूसरों के विचारों से असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन दूसरे के दृष्टिकोण को नजरअंदाज करना संसदीय परंपरा का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ सदस्य अखबारों में जगह पाने की कोशिश करते हैं और सदन से बाहर निकलने के तुरंत बाद मीडिया में बयान देते हैं और लोगों का ध्यान खींचने के लिए सोशल मीडिया का भी इस्तेमाल करते हैं।
सदस्यों के व्यवहार से दुखी नजर आए सभापति
उन्होंने आगे कहा कि कुछ सदस्य सदन में अपने भाषण से एक मिनट पहले आते हैं और भाषण खत्म होने के तुरंत बाद चले जाते हैं। आपकी उपस्थिति का मतलब यह नहीं है कि आप हिट-एंड-रन रणनीति अपनाएं। उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद संवैधानिक मूल्यों और स्वतंत्रता का गढ़ रही है। उन्होंने कहा कि कई बार समस्याएं आई हैं, लेकिन सदन के नेताओं ने बुद्धिमता का प्रयोग करते हुए रास्ता दिखाया है।
राजनीति करना स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए जरूरी- धनखड़
राज्यसभा के सभापति ने कहा कि हम संसदीय प्रणाली को राजनीतिक दल की भूमिका से आकलन कर के नहीं देख सकते। राजनीति का स्थान है, राजनीति करनी होती है। राजनीति करना स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए आवश्यक है। लेकिन राष्ट्र से जुड़े हुए मुद्दों को देखकर, राष्ट्रहित को देखकर, राष्ट्रवाद को समर्पित करते हुए। वहीं अपने संबोधन के दौरान सभापति जगदीप धनखड़ ने कहा कि- एक सदस्य को सस्पेंड किया गया, उन्होंने न्यायपालिका का द्वार खटखटा दिया! संसद के अंदर जो कुछ भी होता है उस पर किसी का हस्तक्षेप नहीं हो सकता सिवाय चेयर के... ना कार्यपालिका का हो सकता है ना किसी और संस्था का हो सकता है। संसद अपनी प्रक्रिया और कार्यवाही के लिए सर्वोच्च है। सदन में, संसद में कोई भी कार्यवाही कार्यपालिका या किसी अन्य प्राधिकारी की समीक्षा से परे है।
आपातकाल के समय को भी धनखड़ ने किया याद
उन्होंने सदस्यों से कहा, लेकिन अब स्थिति चिंताजनक है। अभद्र व्यवहार को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जो लोकतंत्र की भावना पर आघात है। इस दौरान उन्होंने ने अपने भाषण में आपातकाल के दौर का भी जिक्र किया, उन्होंने कहा कि- केवल एक दर्दनाक, हृदय विदारक काला दौर रहा है, जब आपातकाल की घोषणा की गई थी। उस समय हमारा संविधान केवल कागज बनकर रह गया था। इसे फाड़ दिया गया था और नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने आगे कहा कि अगर उस दौर को नजरअंदाज करें तो संसद ने अच्छा काम किया।
'आपातकाल से आहत लालू ने अपनी बच्ची का नाम मीसा रखा'
ओरिएंटेशन कार्यक्रम में जगदीप धनखड़ ने कहा, मीसा (आंतरिक सुरक्षा अधिनियम) एक क्रूर शब्द बन गया। देश के वरिष्ठ राजनेताओं में से एक लालू प्रसाद यादव आपातकाल के अत्याचारों से इतने आहत और द्रवित हुए कि उन्होंने अपनी बच्ची का नाम मीसा रख दिया। बता दें कि मीसा भारती राज्यसभा की सदस्य थीं और वर्तमान में लोकसभा सांसद हैं।