महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में पिछले एक साल में 8 करोड़ मजदूरों को न्यूनतम 45 दिन का ही काम मिला है। बिहार और यूपी के कुछ इलाकों में हालात और भी चिंताजनक हैं। यहां केवल 36 दिन ही काम मिला है। जबकि नियमों के तहत 100 दिन के काम की अनिवार्यता है।
यह खुलासा सिविल सोसाइटी के बैनर तले एकत्र हुए पीपुल एक्शन फॉर इम्प्लॉयमेंट गांरटी संघर्ष मोर्चा, समृद्ध भारत फाउंडेशन और लीडर्स ऑफ फारमर्स मूवमेंट (पीएईजी) के संयुक्त अध्ययन में हुआ। इस अध्ययन के तहत कर्नाटक, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा के ग्रामीण अंचलों में वस्तुस्थिति की जांच की गई। इस वित्त वर्ष के तीन महीने बचे हैं, लेकिन मनरेगा के मद का 99 फीसदी धन खर्च हो गया है।
अब सवाल यह है कि बचे हुए एक फीसदी धन से सरकार कैसे आठ करोड़ वर्करों को तीन महीने भुगतान करेगी। इसका एक उत्साहजनक पहलू यह भी है कि सरकार के ढुलमुल रवैये के बाद भी यह केंद्र सरकार की सफलतम योजनाओं में शुमार है। संयुक्त कमेटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखने का फैसला किया है इसमें वे योजना की समस्याओं का समाधान करने की मांग करेंगे।