रोक के बावजूद दाखिला देने पर मेडिकल कॉलेज पर 2.5 करोड़ का जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को रोक के आदेश के बावजूद एमबीबीएस में 100 छात्रों को प्रवेश देने पर महाराष्ट्र के एक मेडिकल कॉलेज पर 2.5 करोड़ का जुर्माना लगाया है।अन्नासाहेब चूड़ामन पाटिल मेमोरियल मेडिकल कॉलेज को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में चार सप्ताह के भीतर जुर्माने की राशि जमा करने का निर्देश दिया गया है।
शीर्ष अदालत ने कहा, इस पैसे का उपयोग एम्स निदेशक के विवेकानुसार गरीब मरीजों के इलाज के लिए किया जाएगा। पिछले साल एक सुनवाई में, अदालत ने अन्नासाहेब चूड़ामन पाटिल मेमोरियल मेडिकल कॉलेज की तुलना फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' से की थी। अदालत ने कहा था कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की टीम के औचक निरीक्षण में कई बड़ी खामिया सामने आई। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जेबी पारदीवाला की पीठ ने एनएमसी दल के निरीक्षण का उल्लेख किया। शीर्ष अदालत ने कॉलेज को चेतावनी दी कि वह छात्रों से जुर्माने की राशि न वसूले।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच एजेंसियों को लेकर की कड़ी टिप्पणी
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि केंद्र और जांच एजेंसियां बड़ी मछलियों को गिरफ्तार नहीं कर रही हैं जो अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट की सदस्य हैं बल्कि एनडीपीएस मामलों में किसानों और बस स्टैंड पर खड़े किसी व्यक्ति जैसी छोटी मछलियों को पकड़ रही हैं। शीर्ष अदालत की टिप्पणी एक आरोपी की जमानत याचिका पर आई है जिसे उसके खेतों में अफीम पाए जाने के बाद गिरफ्तार किया गया था और वह पांच साल से अधिक समय तक जेल में रह चुका है।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और जे बी पारदीवाला की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की। उन्होंने कहा कि भारत सरकार और जांच एजेंसियां बड़ी मछलियों को गिरफ्तार नहीं कर रही हैं। आप अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट के पीछे क्यों नहीं जाते? उन्हें पकड़ने की कोशिश करें।" आप केवल छोटी मछलियां पकड़ रहे हैं।
दिव्यांग लड़की को एमबीबीएस में दाखिले से इनकार का मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने भाषा और बोलने की समस्या की वजह से एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश से इनकार किए जाने के मामले में पीड़िता के बचाव में कहा, कौन जानता है, किसी दिन वह एक बेहतरीन डॉक्टर बन जाए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ को उसकी जांच करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने मामले में निर्देश दिया कि पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के निदेशक की ओर से मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाए, पीड़िता की जांच करने के लिए भाषा और वाक बाधा के विशेषज्ञ शामिल हों। पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि मेडिकल बोर्ड एक महीने में उसकी जांच के बाद अदालत में रिपोर्ट दाखिल करे। बता दें कि पीड़िता हरियाणा की है।
दाऊदी बोहरा समुदाय के बहिष्करण का मुद्दा SC ने नौ जजों की बेंच को भेजा
सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा के मुद्दे को शुक्रवार को नौ न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के पास भेज दिया। नौ-न्यायाधीशों की पीठ इस मामले में उन सात मुद्दों पर विचार करेगी, जो फरवरी 2020 में शीर्ष अदालत के 2018 के फैसले की समीक्षा से संबंधित मामले में तैयार किए गए थे, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं और लड़कियों को केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी।
दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा से संबंधित मुद्दे से निपटने वाले न्यायमूर्ति एस के कौल की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि याचिका को सबरीमाला मंदिर मामले में दायर समीक्षा याचिका के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
गौरतलब है कि संविधान पीठ में जस्टिस संजीव खन्ना, ए एस ओका, विक्रम नाथ और जे के माहेश्वरी भी शामिल हैं, ने शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को मुख्य न्यायाधीश से इस संबंध में उचित दिशा-निर्देश लेने का निर्देश दिया।
जजों के आचरण, फैसलों में सांविधानिक मूल्यों का पालन दिखना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जनता, वादी और वकील एक जज का हर रोज मूल्यांकन करते हैं, क्योंकि अदालतें खुला मंच हैं। वह सिफारिश को रद्द नहीं कर सकता है या अपने कॉलेजियम को शक्ति का इस्तेमाल करते हुए जजों की नियुक्ति वाले उसके फैसले की न्यायिक समीक्षा करने के लिए नहीं कह सकता। मद्रास हाईकोर्ट के जज के रूप में एलसी विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति के खिलाफ दायर दो याचिकाओं पर विचार से इन्कार के कारण स्पष्ट करते हुए शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी की।
जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने शुक्रवार को कहा, उनको (जस्टिस गौरी) को एक अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया है और शपथ लेने पर व्यक्ति संविधान और कानूनों के अनुरूप काम करने का वचन देता है। सभी धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय विविधताओं के बीच सद्भाव, भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना प्रत्येक नागरिक और एक न्यायाधीश का मौलिक कर्तव्य है। पीठ ने कहा, पुष्टि के समय न केवल आचरण और दिए गए निर्णयों पर विचार किया जाता है बल्कि एक जज को वकीलों, वादियों और जनता द्वारा प्रतिदिन आंका जाता है, क्योंकि अदालतें खुली हैं। जबकि न्यायाधीश अपने निर्णयों के लिए लिखित में कारण देकर बोलते हैं।
पीठ ने कहा, ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहां पदोन्नति के लिए अनुशंसित लोगों ने विरोध जताया है। यहां तक कि नीतियों या कार्यों की आलोचना की है, लेकिन इसे उन्हें अपात्र मानने का आधार नहीं माना गया है। पीठ ने यह भी कहा कि न्यायाधीश के आचरण और फैसलों में स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक और सांविधानिक मूल्यों का पालन दिखना चाहिए।