बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से 150 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। इसे रोकने के लिए केंद्र-राज्य की तरफ से तमाम कोशिशें जारी हैं, लेकिन इन सबके बावजूद एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (चमकी बुखार) से बच्चों के बीमार होने का सिलसिला थमा नहीं है। इसी बीच यूनिसेफ के शीर्ष स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा है कि चमकी बुखार के होने के पीछे स्पष्ट कारण का अभी तक पता नहीं लगाया जा सका है।
इसे पता लगाने की कोशिशें जारी हैं। भूखे पेट लीची खाना बिमारी की आक्रामकता को बढ़ा तो सकता है, लेकिन इसे अंतिम शीर्ष कारण नहीं कहा जा सकता। अंतिम कारण सामने आने से पहले अभिभावक और राज्य अपने बच्चों को चमकी बुखार से बचाने के लिए सुरक्षात्मक उपाय ही अपना सकते हैं।
बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में तकनीकी सहयोग योगदान दे रहे यूनिसेफ के शीर्ष स्वास्थ्य अधिकारी अशदुर्रहमान ने अमर उजाला को बताया कि भूखे पेट लीची खाने से पेट में एक रसायन उत्पन्न होता है जो बच्चों में उलटी करने की समस्या पैदा कर सकता है। यह बच्चों के रक्त में शर्करा की मात्रा को एक स्तर से अधिक बढ़ा सकता है। लेकिन चमकी बुखार के पीछे इसे अंतिम कारण मानने के ठोस प्रमाण अभी हमें नहीं मिले हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश बहुत जरुरी
अशदुर्रहमान ने बताया कि पूरे भारत के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं में भारी निवेश की आवश्यकता है। शुरुआती स्थिति में काम चलाने के लिए भी स्वास्थ्य सेवाओं का बजट कम से कम दो गुना किये जाने की जरूरत है। बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं में भारी मात्रा में पद तो सृजित कर दिए गये हैं, लेकिन इन पदों पर स्वास्थ्य कर्मियों की नियुक्ति नहीं हुई है। डॉक्टर-मरीज का अनुपात बेहद खराब होने के कारण राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई हैं।
कुपोषण का स्तर सुधारने से मिल सकती है राहत
बच्चों में कुपोषण उन्हें किसी भी बीमारी के लिए ज्यादा संवेदनशील बनाता है। इससे उनमें प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम हो जाती है और वे किसी भी बिमारी की चपेट में आसानी से आ जाते हैं। केंद्र/राज्य सरकार को स्थानीय बच्चों का स्वास्थ्य सुधरने के लिए कुपोषण से निबटना ज्यादा आवश्यक है। अशदुर्रहमान ने बताया कि आंगनबाड़ी सरकार की तरफ से एक अच्छी पहल थी जो गरीब बच्चों को कुछ पोषणकारी खाना देने का काम करता है।
लेकिन सच्चाई यह है कि लगभग आधे आंगनबाड़ी केंद्र धरातल पर सही काम नहीं कर रहे हैं। इससे बच्चों के स्वास्थ्य को बड़ा खतरा पैदा हुआ है क्योंकि स्वास्थ्य अधिकारी मानने लगते हैं कि क्षेत्र में काम हो रहा है जबकि जमीनी स्तर पर वहां कोई काम नहीं हो रहा है।
आय और शिक्षा का स्तर ऊपर उठाना जरूरी
अशदुर्रहमान ने बताया कि भारत सरकार के नीति आयोग की हाल ही में जारी रिपोर्ट इस बात को प्रमाणित कर देती है कि जिस राज्य में लोगों की आय अधिक होती है, वहां लोग अपने बच्चों की शिक्षा में ज्यादा निवेश करते हैं। इससे लोगों में स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूकता पैदा होती है और यही राज्य स्वास्थ्य में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
केरल और आंध्र प्रदेश इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। जबकि यूपी-बिहार जैसे राज्यों में निम्न आय के कारण उनके खराब शिक्षा स्तर और बेहद खराब स्वास्थ्य सेवाओं में अंतरसंबंध देखे जा सकते हैं। इन सब परेशानियों से उबरने के लिए राज्य को आधारभूत ढांचे में ज्यादा निवेश की जरूरत है।