Karnataka Politics: फिलहाल कर्नाटक सरकार में सबकुछ शांत दिख रहा है, लेकिन सियासत के अनुभवी लोग मानते हैं- यह शांति स्थायी नहीं। यह बस वक्त का इंतजार है- जब अगला मौका आएगा, सत्ता की लड़ाई एक बार फिर सामने होगी।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच कई दिनों से चल रही सत्ता की खींचतान और बयानबाजी के बाद शनिवार को अचानक हुई सुलह ने राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक हलकों का मानना है कि यह मेल-मिलाप स्थायी नहीं, बल्कि आने वाले सियासी तूफान से पहले की शांति है। शनिवार सुबह दोनों नेता सिद्धारमैया के घर पर नाश्ते के दौरान मिले और उसके बाद एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर 'एकजुटता' का संदेश दिया। दोनों ने कहा कि वे पार्टी हाईकमान के फैसले का पालन करेंगे। यह विवाद कथित तौर पर उस समझौते को लेकर था, जिसमें कहा जा रहा था कि नवंबर 2025 में मुख्यमंत्री बदलकर शिवकुमार को मौका दिया जाएगा।
विपक्ष बोला- दिखावा है, असली लड़ाई अभी बाकी
भाजपा नेता प्रकाश सेशराघवाचार ने इस बैठक को 'सिर्फ दिखावा' बताया। उनका कहना है, 'यह समझौता स्थायी नहीं है। जब कोई नेता सत्ता के लिए ज्यादा महत्वाकांक्षी हो जाता है तो उसे कुछ समय के लिए रोका जा सकता है, पर उसकी महत्वाकांक्षा दोबारा सामने आती है।' उन्होंने दावा किया कि शिवकुमार के समर्थक संतों और विधायकों को दिल्ली भेजा गया था, जिससे दबाव बनाया जा सके। जेडीएस के नेता टी.ए. शरवण ने भी इस सुलह को राजनीति का नाटक बताया और कहा कि जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी।
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राजनीतिक विश्लेषकों की राय- समझौता मजबूरी, कड़वाहट बरकरार
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रामकृष्ण उपाध्याय ने कहा कि यह पूरी मुलाकात कांग्रेस हाईकमान के निर्देश पर हुई। 'दोनों नेता असल में टकराव में थे। बैठक में कोई ठोस समाधान नहीं निकला। यह बस एक ऊपर-ऊपर की पैच-अप एक्सरसाइज थी।' एक अन्य राजनीतिक पर्यवेक्षक ने कहा, 'सिद्धारमैया को प्रशासन चलाने के लिए सहयोगी डिप्टी की जरूरत है और शिवकुमार अपनी छवि खराब नहीं करना चाहते। इसलिए समझौता हुआ, लेकिन मतभेद अब भी गहरे हैं।'
कांग्रेस बोली- विवाद मीडिया और विपक्ष की देन
कांग्रेस प्रवक्ता एम. लक्ष्मण ने कहा कि दोनों नेताओं के बीच कोई विवाद था ही नहीं। 'यह विवाद भाजपा, जेडीएस और कुछ मीडिया की देन है। यह भ्रम फैलाया गया कि कांग्रेस बंटी हुई है, ताकि सरकार अस्थिर लगे।' उन्होंने कहा कि अगर मतभेद होते तो दोनों नेता शनिवार को एक साथ मंच पर दिखाई कैसे देते?
क्या आगे भी सब शांत रहेगा?
राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह समझौता फिलहाल सरकार को चलाए रखने की रणनीति है। भविष्य में जब पार्टी में नेतृत्व बदले या चुनाव नजदीक आए, तब यह टकराव फिर सामने आ सकता है।