त्रिपुरा हाईकोर्ट ने छह हत्या आरोपियों को निचली अदालत द्वारा जमानत दिए जाने पर सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट पहले ही उनकी जमानत याचिका खारिज कर चुका था, फिर भी 25 जुलाई को निचली अदालत ने बेल दे दी। इस पर हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को जांच का आदेश दिया है और आरोपियों को नोटिस भेजा है।
त्रिपुरा हाईकोर्ट ने हत्या के छह आरोपियों को बेलोनिया की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा दी गई जमानत पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हाईकोर्ट ने इस मामले में रजिस्ट्रार (न्यायिक) को जांच के आदेश दिए हैं और आरोपियों को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनकी जमानत रद्द क्यों न की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति बिश्वजीत पालत ने बुधवार को दिया।
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दरअसल, छह आरोपियों ने पहले निचली अदालत में जमानत की याचिका लगाई थी, जिसे अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने भी सबूतों को मजबूत मानते हुए मार्च में उनकी याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बावजूद 25 जुलाई को निचली अदालत ने उन्हीं आरोपियों को फिर से जमानत दे दी, जिससे न्यायिक प्रणाली की गंभीरता पर सवाल उठने लगे हैं।
सीपीआई (एम) नेता की हत्या का मामला
यह पूरा मामला सीपीआई (एम) के उम्मीदवार बादल शील की हत्या से जुड़ा है। पिछले साल 12 जुलाई को दक्षिण त्रिपुरा जिले के चोत्ताखोला क्षेत्र में बादल शील पर कुछ लोगों ने बेरहमी से हमला किया था। उन्हें गंभीर हालत में अगरतला के जीबीपी अस्पताल लाया गया, जहां अगले दिन उनकी मौत हो गई। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर सात लोगों को गिरफ्तार किया और जांच के बाद उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया।
फिर जमानत मिलने पर हाईकोर्ट नाराज
जमानत याचिका खारिज होने के बावजूद जब निचली अदालत ने फिर से बेल दे दी तो यह मुद्दा हाईकोर्ट के समक्ष लाया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता पुरषोत्तम रॉय बर्मन ने अदालत में तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट का यह फैसला हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना है और यह न्यायिक अनुशासन के खिलाफ है। इस पर न्यायमूर्ति पालत ने गंभीर रुख अपनाते हुए कहा कि इस पूरे घटनाक्रम की जांच आवश्यक है।
जांच रिपोर्ट के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी
अब हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक, रजिस्ट्रार (न्यायिक) यह जांच करेंगे कि किन परिस्थितियों में निचली अदालत ने हाईकोर्ट के पूर्व आदेश को नजरअंदाज करते हुए आरोपियों को जमानत दी। साथ ही छहों आरोपियों से जवाब मांगा गया है कि क्यों न उनकी जमानत तत्काल प्रभाव से रद्द की जाए। इस मामले को लेकर त्रिपुरा की न्याय व्यवस्था में हलचल मची हुई है और आने वाले दिनों में हाईकोर्ट की अगली कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।