आगामी विधानसभा चुनाव में सीपीएम और कांग्रेस ने मिलकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। इस एलान के बाद सियासी गलियारे में हलचल तेज हो गई है। कई तरह की अटकलबाजियां भी शुरू हो चुकी है।
त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव का एलान हो गया है। 16 फरवरी को मतदान होगा और दो मार्च को नतीजे आएंगे। इसके कुछ दिन पहले ही धुर राजनीतिक विरोधी कांग्रेस और सीपीएम ने हाथ मिला लिया है। दोनों पार्टियों ने एलान किया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में दोनों मिलकर भाजपा के खिलाफ लड़ेंगे।
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कुछ महीने पहले ही भाजपा ने त्रिपुरा में बिप्लब कुमार देब को हटाकर मानिक साहा को मुख्यमंत्री बनाया था। अब कांग्रेस और सीपीएम के बीच हुए गठबंधन ने कई तरह की चर्चाएं शुरू कर दी हैं। सवाल उठ रहे हैं कि इस गठबंधन से किसे फायदा मिलेगा? सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की लगातार दूसरी जीत दर्ज करने की उम्मीदों पर कितना असर होगा? आइए समझते हैं...
पांच दशक से एक-दूसरे के खिलाफ रहे हैं कांग्रेस और CPM
त्रिपुरा में 1967 से विधानसभा चुनाव हो रहा है। पिछले पांच दशक के राजनीतिक इतिहास में यहां कांग्रेस और सीपीएम हमेशा से एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे। कभी कांग्रेस तो कभी सीपीएम की सत्ता यहां रही। 2018 में भारतीय जनता पार्टी ने यहां दोनों ही पार्टियों को बड़ा झटका दिया। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सत्ता हासिल कर ली। बिप्लब कुमार देब मुख्यमंत्री बने। अब चुनाव से एन पहले कांग्रेस और CPM साथ आ गए हैं।
गठबंधन का कितना होगा असर?
इसे समझने के लिए हमने राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'त्रिपुरा लेफ्ट और कांग्रेस का गढ़ रहा है। दोनों ही पार्टियों ने पिछले 53 साल से ज्यादा यहां राज किया। 2018 में जब भाजपा ने दोनों ही पार्टियों को मात दे दी तो इनकी मुश्किलें बढ़ गईं। भाजपा का इतिहास बताता है कि एक बार जहां वह सत्ता में आ जाती है तो आसानी से नहीं जाती। यही कारण है कि इस बार फरवरी-मार्च में प्रस्तावित चुनाव को देखते हुए कांग्रेस और सीपीएम ने हाथ मिला लिया।'
प्रो. सिंह आगे कहते हैं, '2018 चुनाव से पहले भाजपा ने यहां काफी मजबूती से अपना पांव जमाया। भाजपा ने बड़ी संख्या में गैर कम्युनिस्ट नेताओं को पार्टी से जोड़ा। कांग्रेस और टीएमसी के कई नेता भाजपा के साथ आ गए। पार्टी ने चुनाव में 60 में से 33 सीटों पर जीत हासिल की। आईपीएफटी के साथ भाजपा ने त्रिपुरा में सरकार बनाई और बिपल्ब कुमार को मुख्यमंत्री बने।'
प्रो. सिंह के अनुसार, अब सीपीएम और कांग्रेस के गठबंधन से कुछ सीटों पर कांग्रेस को फायदा हो सकता है, जबकि कुछ सीटों पर भाजपा को नुकसान। सीपीएम से नाराज लोग ही कांग्रेस को वोट देते हैं। अब तक दोनों ने हाथ मिला लिया है तो ये वोट भाजपा में आ सकता है। हालांकि, कुछ ऐसी सीटें हैं जहां सीपीएम का वोट आसानी से कांग्रेस को ट्रांसफर हो जाएगा। इससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
किस क्षेत्र में किन पार्टियों के बीच लड़ाई?
प्रो. अजय के अनुसार, इस बार त्रिपुरा के ग्रामीण इलाकों में सीधी लड़ाई भाजपा बनाम सीपीएम होगी। आदिवासी इलाकों में भाजपा बनाम त्रिपुरा मोथा और शहरी इलाकों में भाजपा बनाम कांग्रेस लड़ाई होगी। शहरी इलाकों में भाजपा काफी मजबूत है। इसका फायदा उसके उम्मीदवारों को मिल सकता है।