गुड़गांव के एक नामी स्कूल में नन्हा
प्रद्युम्न मार दिया जाता है। स्कूल की सुरक्षा से लेकर उसके प्रशासन तक पर गंभीर सवाल उठते रह जाते हैं। लेकिन महीनों के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती। सियासी रसूख वाले इन मालिकानों के लिए बच्चों के जान की कीमत क्या है, इससे साफ हो जाता है। पीलीभीत में पिछले साल हुई घटना याद कीजिए। स्कूल की फीस न दे पाने की वजह से कैसे एक गरीब छात्र और उसके पिता ने खुदकुशी कर ली थी। कैसे सीकर के एक स्कूल में एक्स्ट्रा क्लास के नाम पर छात्राओं के साथ टीचर्स के यौन शोषण का मामला सामने आया था।
ऐसा ही एक मामला कोलकाता के एक स्कूल से भी आया था, जहां दस साल की एक लड़की ने स्कूली माहौल से परेशान होकर जान दे दी थी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े देखें तो देश में हर रोज कोई न कोई छात्र या छात्रा
खुदकुशी करने को मजबूर है। अकेले 2015 में करीब 9 हजार छात्रों ने खुदकुशी की। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में ये संख्या काफी ज्यादा है।
लेकिन सवाल आंकड़े गिनने या उसे देखकर परेशान होने का नहीं है। दिल्ली के मयूर विहार के प्रतिष्ठित स्कूल इस बच्ची की खुदकुशी ने जो सवाल छोड़े हैं, वो बेहद गंभीर हैं। क्या अब ऐसे नामी स्कूलों में गुंडों का राज है? क्या शिक्षकों को बच्चों के साथ बदसलूकी करने, उन्हें फेल करने और उनके साथ बदसलूकी करने का लाइसेंस दे दिया गया है? क्या स्कूल प्रशासन महज कमाई करने के नाम पर बच्चों के साथ कुछ भी कर सकता है और मौत के बाद भी स्कूल के शिक्षक और प्रिंसिपल पूरी दबंगई के साथ खुद को निर्दोष बताकर हंसते हुए ऐसी घटनाओं से पल्ला झाड़ सकते हैं? क्या ऐसे बचेंगी और पढेंगी हमारी
बेटियां और क्या यही है स्किल इंडिया मिशन का असली चेहरा?