‘द स्टोरी ऑफ इंडियाज पार्टिशन’ में लेखक प्रो. राघवेंद्र तंवर का कहना है कि वायसराय माउंटबेटन से दोस्ती निभाने के लिए पं. जवाहरलाल नेहरू ने कई गैर जरूरी फैसले किए। लेकिन तत्कालीन इतिहासकारों ने उनकी इन गलतियों को महानता के आवरण से ढक दिया।
जरूरी नहीं था पंजाब का विभाजन
विभाजन को लेकर आजादी से पहले सांप्रदायिक हिंसा से जूझ रहे पूर्वी बंगाल के मुकाबले पश्चिमी पंजाब बिल्कुल शांत रहा था तो उसकी वजह थी यहां की मिली-जुली संस्कृति। इसलिए माउंटबेटन ने जून 1947 में दावा किया था कि पंजाब का विभाजन नहीं होगा।
जिनकी वजह से देश को विभाजन की विभीषिका झेलनी पड़ी, वही 40 वर्षों तक देश पर राज करते रहे इसलिए इतिहास की इन सच्चाइयों को दबा दिया गया। लेकिन पंजाब के तत्कालीन गवर्नर जेनकिंस जैसे कई अफसरों की डायरियों में दर्ज इन तथ्यों के सहारे तंवर ने अपनी पुस्तक तैयार की है।
गांधी-नेहरू में थी विभाजन पर रार
राममनोहर लोहिया की पुस्तक ‘विभाजन के दोषी’ के हवाले से तंवर ने दावा किया है, नेहरू और महात्मा गांधी के बीच विभाजन के मुद्दे पर असहमति थी। दोनों के बीच 14 जून 1947 को कांग्रेस समिति की बैठक में इतनी गरमागरमी हुई थी कि गांधी बैठक छोड़कर चले गए। लोहिया इस बैठक में मौजूद थे। उनका कहना था, गांधी को मना कर वापस लाया गया और नेहरू ने उन्हें फोन पर सूचना देने का दावा करते हुए कहा कि फोन लाइन खराब होने की वजह से संभवत: गांधीजी पूरी बात समझ नहीं पाए।
जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल
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आखिर ताराचंद जदुनाथ सरकार और आरसी मजूमदार जैसे इतिहासकारों की रिसर्च सतीश चंद्र, विपिन चंद्रा और रोमिला थापर से इतनी अलग क्यों है? सिविल सेवा परीक्षा के लिए जरूरी एनसीईआरटी की किताबों में थापर और चंद्रा द्वारा प्रस्तुत आख्यान ही शामिल किए गए हैं।