-उत्तर प्रदेश को मांग के मुकाबले 2213 मेगावाट कम बिजली मिल पा रही है।
-जम्मू-कश्मीर को मांग के मुकाबले 20 फीसदी कम बिजली मिल रही है।
-गांव ही नहीं शहरों में भी ट्रांसमिशन इन्फ्रास्ट्रक्चर में खामियों के कारण पावर कट की समस्या है।
-बहुत से बिजली वाले गांवों के घरों में कनेक्शन ही नहीं है।
कब माना जाता है गांव में पहुंच गई बिजली
-जब किसी गांव के 10 फीसदी घरों, सार्वजनिक स्थलों और इमारतों में बिजली कनेक्शन हो जाता है।
-स्कूलों, पंचायतों और स्वास्थ्य केंद्रों में बिजली व्यवस्था सुचारू होने पर।
ग्राम ज्योति योजना
-100 फीसदी गांव तक बिजली पहुंचाने के लिए सरकार ने 25 जुलाई, 2015 को दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना शुरू की।
-लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने 76 हजार करोड़ रुपये खर्च किए।
-योजना के तहत फीडर अलग किए गए, वितरण नेटवर्क मजबूत किया गया, माइक्रो ग्रिड और ऑफ-ग्रिड नेटवर्क स्थापित किए गए।
-हर घर तक बिजली पहुंचाने के लिए सितंबर, 2017 में शुरू की सौभाग्य परियोजना।
-परियोजना को 16,320 करोड़ की जरूरत, बजट में आवंटित हुए 12,320 करोड़ रुपये।
-गांव में हर घर बिजली के लिए चाहिए 14,025 करोड़, जबकि मिला 10,587 करोड़।
-शहरी इलाकों में हर घर बिजली के लिए चाहिए 2295 करोड़, जबकि मिला 1732 करोड़।
मध्य प्रदेश के कुछ गांव बिजली से महरूम
मध्य प्रदेश के कुछ गांव के लोग अब भी नहीं जानते कि बिजली क्या होती है। ऐसे ही कुछ गांवों में नर्मदा किनारे बसे अलीराजपुर, झांदना, अंबा समेत पांच गांव में बिजली पहुंची ही नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश के करीब 50 गांव अब भी बिजली से महरूम हैं। खुद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र में पड़ने वाले जैतगढ़, बिली, पोंद, रामगढ़, खाननपुरा, गोपलपुर में बिजली नहीं है।
झारखंड के खरसावा जिले में पड़ने वाले सपरम गांव में आज भी सिर्फ बिजली के खंभे लगे हैं। आज भी वहां रातें अंधेरी और मौसम तपिश भरा ही है। राज्य में ऐसे दर्जनों गांव हैं, जहां विद्युतीकरण के नाम पर सिर्फ खंभे लगे हैं।
राजस्थान की तस्वीर भी कुछ अलग नहीं
सरकार बेशक दावा करे कि देश के हर गांव में बिजली पहुंचा दी गई है, लेकिन हकीकत ये है कि अभी भी राजस्थान के दर्जनों गांवों में बिजली नहीं पहुंची। अकेले धौलपुर में खेड़ी का नगला, राजघाट, हरिपुर, गोले का पुरा समेत आधे दर्जन गांव के लोगों को नहीं पता कि गर्मी से बचने के लिए कूलर में बैठने का अनुभव कैसा होता है। इन गांवों के लोगों ने तो सरकार पर भरोसा करने के बजाय खुद भी प्रयास किया, लेकिन उम्मीद सिर्फ उम्मीद बनकर रह गई।