साठ और सत्तर के दशक में एक शख्स ऐसा हुआ करता था, जो कागजों का पुलिंदा बगल में दबाए हुए जब संसद में प्रवेश करता था तो ट्रेजरी बेंच पर बैठने वालों की फूंक सरक जाया करती थी कि न जाने आज किसकी शामत आने वाली है।
जी हाँ, जिक्र हो रहा है समाजवादी आंदोलन के नेताओं में से एक मधु लिमये का। बहुत से लोगों को उनसे चिढ़ भी हुआ करती थी। उनको लगता था कि 1979 में उनका बना बनाया खेल मधु लिमये की वजह से बिगड़ गया।
उधर समाजवादियों को भी डर लगा रहता था कि पता नहीं कुर्सी की दौड़ में जीतने के लिए उनकी वक्ती तिकड़मबाजियां मधु लिमये को कितनी नागवार गुजरें।
पेंशन के खिलाफ थे मधु लिमये
तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थ के समय ही सुनाई देने वाली 'अंतरात्मा की आवाज' के दौर में, मधु लिमये लोकतंत्र, आडंबरहीनता और साफ सार्वजनिक जीवन के पहरेदार बन गए थे। मशहूर समाजवादी चिंतक और मधु लिमये को नजदीक से जानने वाले रघु ठाकुर बताते हैं, "मधु आजीवन योद्धा रहे। वो 14-15 साल की उम्र में आजादी के आंदोलन में जेल चले गए और जब 1944 में विश्व युद्ध खत्म हुआ तब छूटे और जब गोवा की मुक्ति का सत्याग्रह शुरू हुआ तो उसमें वो फिर जेल गए और उन्हें बारह साल की सजा हुई।"
वो बताते हैं, "यही नहीं जब उन पर लाठियाँ चलीं तो मुंबई के अखबारों में छप गया कि 'मधु लिमये गेले' यानी मधु लिमये का निधन हो गया। बहुत से लोग उनकी पत्नी चंपा लिमये के पास श्रद्धांजलि देने पहुंच गए। इसके अलावा जब देश में आपातकाल लगा तो वो 19 महीनों तक जेल में रहे।" वो कहते हैं कि मधु लिमये की राय थी कि सांसदों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए।
वो बताते हैं, "उन्होंने न सिर्फ सांसद की पेंशन नहीं ली बल्कि अपनी पत्नी को भी कहा कि उनकी मृत्यु के बाद वो पेंशन के रूप में एक भी पैसा न लें। 1976 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान संसद का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया तब भी उन्होंने पांच साल पूरे होने पर लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।"
'आप बड़े कटु लिमये हैं!'
Madhu Limaye
मधु लिमये ने दुनिया को बताया कि संसद में बहस कैसे की जाती है। वो प्रश्न काल और शून्य काल के अनन्य स्वामी हुआ करते थे। जब भी जीरो आवर होता, सारा सदन सांस रोक कर एकटक देखता था कि मधु लिमये अपने पिटारे से कौन-सा नाग निकालेंगे और किस पर छोड़ देंगे।
मशहूर पत्रकार और एक जमाने में मधु लिमये के नजदीकी रहे डॉक्टर वेद प्रताप वैदिक याद करते हैं, "मधुजी गजब के इंसान थे। जबरदस्त प्रश्न पूछना और मंत्री के उत्तर पर पूरक सवालों की मशीनगन से सरकार को ढेर कर देना मधु लिमये के लिए बाएं हाथ का खेल था।"
वो बताते हैं, "होता यूँ था कि डॉक्टर लोहिया प्रधान मल्ल की तरह खम ठोंकते और सारे समाजवादी भूखे शेर की तरह सत्ता पक्ष पर टूट पड़ते और सिर्फ आधा दर्जन सांसद बाकी पाँच सौ सदस्यों की बोलती बंद कर देते। मैं तो उनसे मजाक में कहा करता था कि आपका नाम मधु लिमये है। लेकिन आप बड़े कटु लिमये हैं!"
जब रात में भी चला संसद का काम
मधु लिमये को अगर संसदीय नियमों के ज्ञान का चैंपियन कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनके एक और साथी और मशहूर समाजवादी नेता लाडलीमोहन निगम ने एक बार एक लेख में एक घटना का जिक्र किया था। "एक बार इंदिरा गांधी ने लोकसभा में बजट पेश किया जो आर्थिक लेखानुदान था। भाषण समाप्त होते ही मधु लिमये ने व्यवस्था का प्रश्न उठाना चाहा, लेकिन स्पीकर ने सदन को अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया।"
मधु झल्लाते हुए उनके चैंबर में गए और बोले, 'आज बहुत बड़ा गुनाह हो गया है। आप सारे रिकॉर्ड्स मंगवा कर देखिए। मनी बिल तो पेश ही नहीं किया गया। अगर ऐसा हुआ है तो आज 12 बजे के बाद सरकार का सारा काम रुक जाएगा और सरकार का कोई भी महकमा एक भी पैसा नहीं खर्च कर पाएगा।' जब स्पीकर ने सारी प्रोसीडिंग्स मंगवा कर देखी तो पता चला कि धन विधेयक तो वाकई पेश ही नहीं हुआ था।
वो घबरा गए क्योंकि सदन तो स्थगित हो चुका था।" तब मधु ने कहा 'ये अब भी पेश हो सकता है। आप तत्काल विरोधी पक्ष के नेताओं को बुलवाएं।' उसी समय रेडियो पर घोषणा करवाई गई कि संसद की तुरंत एक बैठक बुलवाई गई है। जो जहां भी है तुरंत संसद पहुंच जाए। संसद रात में बैठी और इस तरह धन विधेयक पास हुआ।'
एक उदार पिता थे मधु लिमये
Madhu Limaye
मधु लिमये की भाषा इतनी गजब की थी कि जब वो बोलते थे अंग्रेजी का एक भी शब्द वो अपनी भाषा में नहीं आने देते थे। संसद में अंग्रेजी का इस्तेमाल उन्होंने बहुत कम किया जबकि वो बहुत अच्छी अंग्रेजी जानते थे। वो कहते थे कि अगर मैं देश की जनता की बात कर रहा हूँ तो उसकी जुबान में क्यों न करूँ?
मधु लिमये को शतरंज का खेल बहुत पसंद था। वो और उनके बेटे अनिरुद्ध बड़े चाव से इस खेल को खेलते थे। अनिरुद्ध लिमये बताते हैं, "वो बहुत स्नेही और उदार पिता थे। उन्होंने कभी किसी के साथ कभी कोई जबरदस्ती नहीं की। मेरे साथ ही नहीं, उनकी हर छोटे बच्चे से बहुत पटती थी।
वो बच्चों के साथ उनके बचपने का ख्याल रखते हुए भी एक वयस्क की तरह व्यवहार करते थे।" वो कहते हैं, "वो हमसे हर चीज पर बात करते थे और बहुत सारे प्रश्न पूछते थे। बचपन की मेरी याद है कि जब मेरी माँ नहीं होती थीं तो वो अक्सर अपने हाथों से मुझे नहलाया करते थे।"
संगीत की बारीकियां भी समझते थे
मधु लिमये की रुचियों की रेंज बहुत विस्तृत हुआ करती थी। 'महाभारत' पर तो उनको अधिकार-सा था। संस्कृत भाषा और भारतीय बोलियों के वो बहुत जानकार थे। संगीत और नृत्य की बारीकियों को भी वो बखूबी समझते थे। जानी-मानी नृत्यांगना सोनल मानसिंह उनकी नजदीकी दोस्त हुआ करती थीं। सोनल बताती हैं, "उस जमाने में राजनीतिज्ञ इतने नीरस और गैर कलात्मक नहीं होते थे। पहली मुलाकात के बाद मधुजी ने इच्छा जाहिर की कि मैं लोधी गार्डन में टहलने के बाद सुबह नाश्ते के लिए उनके घर आऊं।"
वो बताती हैं, "मैं जब पहुंची तो घाघरा और टी शर्ट पहने हुए थी। मुझे देखते ही उन्होंने 'शाकुंतलम' से श्लोक पढ़ना शुरू कर दिया और बोले कि तुम एकदम शकुंतला जैसी लग रही हो। जब भी मैं उन्हें फोन करती तो उनकी पत्नी चंपा फोन उठातीं और हंसते हुए उनसे कहतीं, 'लो तुम्हारी गर्लफ्रेंड का फोन है।' "मुझे याद है एक बार मॉर्डन स्कूल में रविशंकर और अली अकबर खाँ का प्रोग्राम था। वो सीधे हवाई अड्डे से कार्यक्रम में पहुंचे थे। कार्यक्रम शुरू होने के बाद मैंने देखा कि मधुजी थोड़े बेचैन से हो रहे हैं। मैंने उनसे पूछा कि आप इतने अनमने से क्यों हैं तो कहने लगे कि सितार तो मिली हुई नहीं हैं तो कैसे सुनूँ?
तब मुझे अहसास हुआ कि संगीत में भी उनका कितना दखल है।" सोनल मानसिंह एक और मार्मिक किस्सा सुनाती हैं, "बात उस समय की है जब मैं अपना घर बनवा रही थी। एक दिन मैं उनके घर गई। जब चलने लगी तो उन्होंने एक लिफाफा मेरे हाथ में रख दिया और कहा कि घर जा कर खोलना। घर आकर जब मैंने लिफाफा खोला तो उसमें 5001 रुपये थे। मेरी आँखों में आंसू आ गए।" वो बताती हैं, "मैंने उन्हें फोन किया तो बोले किताब की रायल्टी से ये पैसे आए हैं। ये मेरा छोटा-सा कांट्रीब्यूशन है तुम्हारे घर के बनने में।" वो कहती हैं, "मधुजी की आवाज बहुत भारी थी। बिल्कुल ऐसी जैसे कोहरे में चलने वाले शिप के हॉर्न की आवाज। इसलिए मैं उनकी आवाज को फॉग हॉर्न कहा करती थी।"
फिजूलखर्ची पसंद नहीं करते थे
डॉक्टर वैदिक बताते हैं कि उन्होंने मधु लिमये को कभी फिजूलखर्ची करते नहीं देखा। उनके साथ घर की खिचड़ी और नॉर्थ एवेन्यू की कैंटीन का ढाई रुपए वाला खाना उन्होंने कई बार खाया था। वो कहते हैं कि उनकी पत्नी पहले हमेशा साधारण तृतीय श्रेणी में और जब तृतीय श्रेणी खत्म हुई तो द्वितीय श्रेणी में यात्रा करती थीं।
उनके पंडारा रोड के छोटे-से फ्लैट की छोटी-सी बैठक में अनेक राज्यपाल, अनेक मुख्यमंत्री, अनेक केंद्रीय मंत्री और विख्यात संपादक, पत्रकार और बुद्धिजीवी उन्हें घेरे रहते थे। मधु लिमये की सादगी का आलम ये था कि उनके घर में न तो फ्रिज था, न एसी और न ही कूलर। कार भी नहीं थी उनके पास। हमेशा ऑटो या बस से चला करते थे।
चटख गर्मी में कूलर या एयरकंडीशनर की जगह पंखे से निकलती गरम हवा में सोना या खुद चाय, कॉफी या खिचड़ी बनाना न तो उनकी मजबूरी थी और न ही नियति। यह उनकी पसंद थी। रघु ठाकुर बताते हैं, "एसी उन्होंने कभी लगाया नहीं। जब बाद में वो बीमार पड़े तो हम लोगों ने काफी जिद की कि आपके यहाँ एसी लगवा देते हैं। लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं हुए।"
सांसद नहीं रहे तो तुरंत घर खाली किया
रघु ठाकुर बताते हैं, "वो कभी-कभी हमारे स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ कर जाया करते थे। इतनी नैतिकता उनमें थी कि जब उनका संसद में पांच साल का समय खत्म हो गया तो उन्होंने जेल से ही अपनी पत्नी को पत्र लिखा कि तुरंत दिल्ली जाओ और सरकारी घर खाली कर दो।" "चंपाजी की भी उनमें कितनी निष्ठा थी कि वो मुंबई से दिल्ली पहुंची और वहाँ उन्होंने मकान से सामान निकाल कर सड़क पर रख दिया। उनको ये नहीं पता था कि अब कहाँ जाएं। एक पत्रकार मित्र जो समाजवादी आंदोलन से जुड़े हुए थे, वहाँ से गुजर रहे थे, उन्होंने उनसे पूछा कि आप यहाँ क्यों खड़ी हैं?
जब उन्होंने सारी बात बताई तो वो उन्हें अपने घर ले गए।" बहुत ही पारदर्शी व्यक्तित्व था मधु लिमये का। ईमानदारी उनमें इस हद तक भरी हुई थी जिसकी आज के युग में कल्पना भी नहीं की जा सकती। वेद प्रताप वैदिक बताते हैं, "एक बार मैं उनके घर में अकेला था। डाकिए ने घंटी बजाकर कहा कि उनका 1000 रुपए का मनीऑर्डर आया है। मैंने दस्तखत करके वो रुपए ले लिए। शाम को जब वो आए तो वो रुपए मैंने उन्हें दिए। पूछने लगे कि ये कहाँ से आए। मैंने उन्हें मनीऑर्डर की रसीद दिखा दी। पता ये चला कि संसद में मधु लिमये ने चावल के आयात के सिलसिले में जो सवाल किया था उससे एक बड़े भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ था और उसके कारण एक व्यापारी को बहुत लाभ हुआ था और उसने ही कृतज्ञतावश वो रुपए मधुजी को भिजवाए थे।"
वो बताते हैं, "रुपए देखते ही मधुजी बोले हम क्या किसी व्यापारी के दलाल हैं? तुरंत ये पैसे उसे वापस भिजवाओ। दूसरे ही दिन मैं खुद पोस्ट ऑफिस गया और वो राशि उन सज्जन को वापस भिजवाई।" 1977 में जब जनता पार्टी बनी तो मोरारजी देसाई ने उन्हें मंत्री बनाने की पेशकश की। लेकिन उन्होंने वो पद स्वीकार नहीं किया। रघु ठाकुर याद करते हैं, "पहले उनका नाम जनता पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए तय हुआ था। सुबह इसका एलान होना था। लेकिन जब मोरारजी देसाई इसका एलान करने के लिए खड़े हुए तो कुछ लोगों ने उन्हें रोका और जोड़-तोड़ करके उन्हें अध्यक्ष नहीं बनने दिया गया।" वो बताते हैं, "उसके बाद उनसे कहा गया कि आप विदेश मंत्री बन जाइए। लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। तब उनसे कहा गया कि आप अपने स्थान पर किसी को नामजद करिए। तब उन्होंने छत्तीसगढ़ के एक समाजवादी नेता पुरुषोत्तम कौशिक का नाम सुझाया। इस तरह कौशिक को मोरारजी मंत्रिमंडल में जगह मिली।"
गिरा दी थी मोरारजी देसाई की सरकार
1979 में मधु लिमये ने जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता का मुद्दा जोरशोर से उठाया जिसकी वजह से जनता पार्टी में विभाजन हुआ और मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई। रघु ठाकुर बताते हैं, "मैं तो मानता हूँ कि अगर मधु लिमये जनता पार्टी के अध्यक्ष हो जाते तो जनता पार्टी कभी टूटती ही नहीं। मधु लिमये टूट नहीं चाहते थे, लेकिन वो वैचारिक राजनीति की स्पष्टता के पक्षधर भी थे।"
वो कहते हैं, "मधु लिमये राजनीति में धर्म के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं थे, इसलिए उन्होंने दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया। सांप्रदायिकता का विरोध करने वाला उनके जैसा नेता मैंने कभी नहीं देखा।" "जब जनता पार्टी बन रही थी तो ये सवाल उठा था कि जनता पार्टी में शामिल होने वाले जनसंघ घटक और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बीच क्या संबंध हो। तब संघ ने कहा था कि जनसंघ और उनमें कोई संबंध नहीं है।
लेकिन बाद में ये बात गलत साबित हुई। जब जनसंघ के लोगों को काफी सीटें मिल गईं तो उन्होंने पहले लिए गए फैसले को पलट दिया।" रघु ठाकुर के अनुसार "पार्टी बनाना कुछ लोगों की मजबूरी थी और पार्टी तोड़ना कुछ लोगों का षडयंत्र था, लेकिन उसका दोष उन्होंने मधु लिमये पर लगा दिया। मधु लिमये का इस टूट से कोई संबंध नहीं था।" "मधु लिमये को इस लिए निशाना बनाया गया क्योंकि उनकी प्रतिभा और उनकी बेबाकी से व्यवस्था के बहुत से लोगों को भय था।"