नवगठित लोकसभा ने अपने पहले सत्र में रिकॉर्ड काम किया। 37 दिन के सत्र में 32 विधेयक पारित किए गए। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया गया, आम बजट पारित हुआ और तीन तलाक विधेयक पारित करने से लेकर अनुच्छेद 370 पर लाए संवैधानिक प्रस्ताव जैसे महत्वपूर्ण काम किए गए। लेकिन एक काम फिर भी रह गया - लोकसभा के उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हो पाया।
संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार लोकसभा के गठन के बाद सदन की कार्वाही चलाने के लिए शीघ्रातिशीघ्र एक-एक सांसद को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुना जाएगा।
इस बार लोकसभा का पहला सत्र 17 जून से शुरू हुआ और कार्यवाहक अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार द्वारा नवनिर्वाचित सांसदों को शपथ दिलाने के बाद 19 जून के ओम बिड़ला अध्यक्ष चुने गए। पहले सत्र की अवधि 26 जुलाई तक थी। लेकिन सरकार ने कुंछ महत्वपूर्ण काम निपटाने के लिए इसे दस दिन के लिए बढा दिया था। लेकिन इस दौरान उपाध्यक्ष का चुनाव न हो सका।
भाजपा इस बार भी यह पद सबसे बड़ी विपक्षी दल कांग्रेस को नहीं देना चाहती है। उसके बाद सबसे बड़ा दल 23 सांसदों वाला डीएमके है। फिर 22 सांसदों वाले तृणमूल और वाईएसआर कांग्रेस हैं। राजनीतिक कारणों से ये दोनों ही नहीं बल्कि 12 सांसदों वाली बीजू जनता दल भी यह पद लेने से इंकार कर चुके हैं।
ऐसे में विकल्प 18 सांसदों वाली शिवसेना या 16 सांसदों वाली जद यू है। लेकिन यह दोनों सत्तारूढ गठबंधन का हिस्सा हैं। फिर 10 सांसदों वाली बसपा या 9 सांसदों वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति का नंबर है।