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हम भीख नहीं मांगना चाहते, हम काम चाहते हैं लेकिन लोग डर कर हमसे दूर रहने लगे हैं: कुलियों की आपबीती

Wed, 03 Jun 2020 07:22 AM IST
श्रीधर मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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फाइल फोटो - फोटो : PTI
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लॉकडाउन खत्म होने के बाद रेलगाड़ियां तो पटरी पर फिर से चलने लगी हैं, लेकिन कुलियों की जिंदगी अभी भी बेपटरी है। मार्च में लॉकडाउन लगने के बाद से ही उनकी आजीविका पर ब्रेक लग गई थी और अभी भी रोजी-रोटी के संकट ने उनकी जिंदगी को पटरी से उतार दिया है।

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लाल शर्ट और बाजू पर तांबे के बैंड के साथ भीड़-भाड़ वाले स्टेशन पर ट्रेन के आते ही सीढ़ियों पर दौड़ते और कंधे पर बैग टांगे देखे जाने वाले कुली आज गरीबी और भुखमरी के कगार पर हैं। चार दशकों से कुली का काम कर रहे 60 वर्षीय सुबे सिंह ने बताया कि कुलियों की जिंदगी, 1983 की अमिताभ बच्चन की तड़क-भड़क और रूमानियत वाली फिल्म ‘कुली’ की याद दिलाती है, लेकिन अब वह चमक फीकी पड़ने लगी है। इस फिल्म ने पहली बार यात्रियों का बोझ उठाने वाले इस तबके के संघर्ष को सबके सामने रखा, लेकिन इतने साल बाद भी कुलियों की जिंदगी नहीं बदली और तीन महीने के लॉकडाउन ने उन्हें रोजी रोटी के लिए मोहताज कर दिया है। 

पांच लोगों के परिवार के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास किराए के कमरे में रहने वाले और हालातों से निराश सिंह ने बताया कि हम चटनी-रोटी या कभी-कभी नमक और रोटी खाकर गुजारा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मकान मालिक ने किराया तक माफ नहीं किया और उनका राशन कार्ड भी नहीं है। उधार पर गुजारा हो रहा है। ऐसा बुरा समय पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखा है। 
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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर कई कुलियों ने बताया कि कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए 25 मार्च को शुरू हुए लॉकडाउन की वजह से रेलगाड़ियां थम गई थीं तब से उन्होंने एक रुपया भी नहीं कमाया है। रेलवे की तरफ से प्रमुख मार्गों पर सेवाओं को फिर से शुरू करने के बाद भी पर्याप्त कमाई की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।

अपने पैसे से खरीदे मास्क, सैनिटाइजर और दस्ताने

रेलवे ने पिछले महीने श्रमिक स्पेशल ट्रेनें और कुछ अन्य स्पेशल ट्रेनें शुरू कर दी थीं। 60 वर्षीय कुली शब्बीर अहमद ने बताया कि हालांकि, कई कुलियों ने अपने पैसे से मास्क, सैनिटाइजर और दस्ताने खरीदे हैं, लेकिन कोविड-19 के डर की वजह से लोग हमसे दूर ही रहते हैं। कई यात्री अपने सामान खुद ही उठा लेते हैं, जिससे हमारा काम बेमानी हो गया है। उन्होंने बताया कि हमारे पास कोई चिकित्सा लाभ या बीमा नहीं है। हम रोज मेहनत करते हैं लेकिन हम सड़कों पर भीख नहीं मांग सकते। हम काम और मदद चाहते हैं।

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