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साक्षात्कार: भारतीय नारी का स्वरूप है गजल- वसीम बरेलवी

Mon, 08 Oct 2018 06:28 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मशहूर शायर पद्मश्री प्रो. वसीम बरेलवी कहते हैं शायरी की सबसे बड़ी विधा गजल है। वक्ती हवाओं से गजल मुतासिर नहीं हो सकता। इसमें परिवर्तित करने की क्षमता है। यह अपनी विरासत को संभाले हुए है। सही मायने में भारतीय नारी का स्वरूप है। तभी तो गजल आज भी प्रासंगिक है।

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प्रो. बरेलवी रविवार को गोरखपुर में कवि सम्मेलन में शरीक होने आए थे। ‘अमर उजाला’ से उन्होंने साहित्य और सियासत के स्वरूप और बदलाव पर खुलकर बातचीत की। 

उन्होंने कहा कि गजल ही एक ऐसी विधा है जिसमें समय के हिसाब से बदलाव आता गया। उन्होंने खान-खाहियत, तरक्की पसंद और आज के दौर की चर्चा कर इसे भारतीय नारी के स्वरूप से बड़ी साफगोई से जोड़ा। कहा कि जैसे भारतीय नारी का कई स्वरूप है, इसी तरह गजल भी है। साहित्य में सियासत पर कहा, साहित्य कभी राजनीति से प्रभावित नहीं हो सकती। अगर प्रभावित स्वरूप दिखता है तो वह साहित्य नहीं है। 
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साहित्य तो चिंतन में तब्दीली लाता है, समाज को दिशा देता है, इंसान की बेहतरी के ख्वाब देखता है। जबकि सियासत में नफा-नुकसान छिपा है। प्रो. बरेलवी ने प्रजातांत्रिक ढांचे पर भी सवाल उठाए। कहा, सबसे चिंता करने वाली बात है कि प्रजातंत्र सुरक्षित नहीं है। हमारी प्राथमिकताएं उधार की हैं, हम अपने मूल से विरत हो गए हैं। त्याग, बलिदान, निष्ठा की जगह भौतिकवादिता ने ले लिया है। इसका असर समाज से लेकर शायरी तक पड़ा है। 

शार्टकट से बचें, पहले पढ़ें फिर लिखें युवा

सोशल मीडिया से साहित्य को होने वाले नुकसान पर प्रो. बरेलवी कहते हैं, युवाओं में समझ तो है पर सहनशीलता नहीं। साहित्य साधना का मामला है। गजल की 300 वर्ष पुरानी विद्या को समझे कोई कैसे लिख-पढ़ सकता है। युवा शार्टकट से बचें। 

सहूलियत नहीं जरूरत की चीज है गांधी के विचार

प्रो. वसीम बरेलवी ने कहा कि देश में महात्मा गांधी की जयंती मनाई जा रही है। गांधी जी इंसानियत के प्रतीक हैं। उनके विचार सहूलियत नहीं बल्कि जरूरत की चीज हैं। यही वजह है कि उनके विचार हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।

चरित्र निर्माण अभियान की जरूरत 

प्रो. बरेलवी ने कहा कि हमने अपने आदर्श पुरुषों के महत्व को खंडित कर दिया है। देश की तरक्की व खुशहाली के लिए बहुत सारे अभियान और योजनाएं चल रहीं हैं। पर मेरा मानना है कि आज जरूरत है चरित्र निर्माण अभियान शुरू करने की। हिंदुस्तान की परंपरा करुणा, उदारता और सहनशीलता पर टिकी है। इसके बिना सब बेकार है। देश को संभालना है तो घर से संभलना होगा। मैं तो अब हार मान चुका हूं, यह जिम्मेदारी युवा पीढ़ी पर है।

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