यह काम मैं खुद को साधारण-सा व्यक्ति मानकर करता हूं। मैं राजस्थान में टोंक जिले के लांबा गांव का रहने वाला हूं। मेरे पिता गांव के मंदिर में महंत हैं। मेरी मां हमेशा पौधे लगाने और उनकी देखभाल के लिए प्रेरित करती रहती थी, जिसके चलते बचपन से ही मेरा पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों से लगाव हो गया। मैं तब सात वर्ष का था, जब अपने बाड़े (घर के पास स्थित जानवर रखने की जगह) में तरह-तरह के पौधे लगाना शुरू कर दिया। चूंकि मेरे पास तब पैसे नहीं होते थे, लेकिन पौधे लगाने के जुनून के चलते मैं किसी के भी घर और खेत से पौधा चुराने में हिचकता नहीं था।
मेरी इन आदतों से तंग आकर घरवालों ने मुझे बुआजी के यहां पढ़ने के लिए भेज दिया। पर एक-दो बार लालच में आकर मैंने वहां भी पौधों चुराए तो मुझे मेरे ताऊजी के पास जयपुर भेज दिया गया। जयपुर आकर मुझे तरह-तरह के पौधे देखने को मिले, जो बेहद खूबसूरत थे। जयपुर में जवाहर सर्किल में ताऊजी के घर से थोड़ी दूर पर कलेक्टर श्रीमत पांडे का घर बना हुआ था, जिसमें उनके कोई रिश्तेदार रहते थे। वहां बड़ी-सी नर्सरी थी, जिसमें खूब सारे पौधे थे। एक रात लघुशंका का बहाना बनाकर मैं घर से निकला और पांडे जी की नर्सरी में पहुंच गया। इसके बाद वहां से तुलसी, काजू, चीकू, अमरूद और अनार के पौधे चुराए और उन्हें चाचा जी के घर पर रोप दिया।
जब सुबह उठकर ताऊजी ने हरियाली देखी तो चौंक पड़े। मुझे बुलाया और कहा कि, मैं शाम तक सोच लूं कि मुझे अपनी सफाई में क्या कहना है। इधर मैं सोच रहा था कि आखिर होगा क्या। दो-चार डंडे पड़ेंगे, खा लेंगे, पौधे तो नहीं जाने दूंगा। शाम को ताऊजी ने खूब पिटाई की, अंत में बताना पड़ा कि पौधे कहां से लाया हूं। ताऊजी पांडेजी के घर ले गए, और बोले कि इससे सारे पौधे वापस लो और सजा दो। लेकिन पौधों के प्रति मेरा प्रेम देखकर श्रीमंत पांडेजी ने न सिर्फ मुझे माफ किया, बल्कि वह पौधे भी दे दिए।