The Dam Safety Bill: बांध सुरक्षा विधेयक पर सरकार ने क्यों नहीं मानी विपक्ष की मांग, तमिलनाडु इसके खिलाफ क्यों है?
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Sat, 04 Dec 2021 05:38 PM IST
सार
विपक्ष ने मांग की, कि इस पर आगे चर्चा करने के लिए इसे संसद की स्थायी समिति के पास भेजा जाए। हालांकि, इस आशय का एक प्रस्ताव सदन में विफल रहा।
केंद्रीय जलशक्ति मंत्री और पंजाब में भाजपा के चुनाव प्रभारी गजेंद्र सिंह शेखावत
- फोटो : amar ujala
विपक्ष की कड़ी आपत्तियों के बीच संसद ने बांध सुरक्षा विधेयक को पारित कर दिया। लोकसभा ने जहां अगस्त 2019 में इसे पारित किया था, वहीं गुरुवार को राज्यसभा ने इसे मंजूरी दे दी थी। विधेयक को पारित कराने से पहले विस्तृत चर्चा के लिए विधेयक को संसद की स्थायी समिति के पास भेजने की विपक्ष की मांग को सरकार ने ठुकरा दिया। विधेयक के पारित होने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर बांध सुरक्षा विधेयक पारित करते समय राज्यों के हितों पर विचार नहीं करने के लिए केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की है।
बांध सुरक्षा विधेयक क्या है?
विधेयक में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को समान बांध सुरक्षा प्रक्रियाओं को अपनाने में मदद करने का प्रस्ताव है। एक नियामक संस्था के जरिए बांधों की निगरानी, निरीक्षण, संचालन और रखरखाव का प्रावधान इसमें शामिल है। इसमें 15 मीटर से अधिक ऊंचाई या 10-15 मीटर की ऊंचाई वाले बांध, विशिष्ट डिजाइन और स्ट्रक्चर वाले बांध भी शामिल हैं।
सरकार ने दिया यह जवाब
विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजने की विपक्ष की मांग पर बांध सुरक्षा विधेयक पर राज्यसभा में हो रही चर्चा के दौरान जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि देश में अब तक 42 बांध टूट चुके हैं। स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर ही इस विधेयक को बनाया गया है। उन्होंने कहा कि इस पर कानून तुरंत बनाया जाना चाहिए, क्योंकि यह विधेयक पहले ही 2019 में लोकसभा से पारित हो चुका है।
केंद्रीय जलशक्ति मंत्री और पंजाब में भाजपा के चुनाव प्रभारी गजेंद्र सिंह शेखावत
- फोटो : amar ujala
विपक्ष की कड़ी आपत्तियों के बीच संसद ने बांध सुरक्षा विधेयक को पारित कर दिया। लोकसभा ने जहां अगस्त 2019 में इसे पारित किया था, वहीं गुरुवार को राज्यसभा ने इसे मंजूरी दे दी थी। विधेयक को पारित कराने से पहले विस्तृत चर्चा के लिए विधेयक को संसद की स्थायी समिति के पास भेजने की विपक्ष की मांग को सरकार ने ठुकरा दिया। विधेयक के पारित होने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर बांध सुरक्षा विधेयक पारित करते समय राज्यों के हितों पर विचार नहीं करने के लिए केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की है।
बांध सुरक्षा विधेयक क्या है?
विधेयक में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को समान बांध सुरक्षा प्रक्रियाओं को अपनाने में मदद करने का प्रस्ताव है। एक नियामक संस्था के जरिए बांधों की निगरानी, निरीक्षण, संचालन और रखरखाव का प्रावधान इसमें शामिल है। इसमें 15 मीटर से अधिक ऊंचाई या 10-15 मीटर की ऊंचाई वाले बांध, विशिष्ट डिजाइन और स्ट्रक्चर वाले बांध भी शामिल हैं।
सरकार ने दिया यह जवाब
विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजने की विपक्ष की मांग पर बांध सुरक्षा विधेयक पर राज्यसभा में हो रही चर्चा के दौरान जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि देश में अब तक 42 बांध टूट चुके हैं। स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर ही इस विधेयक को बनाया गया है। उन्होंने कहा कि इस पर कानून तुरंत बनाया जाना चाहिए, क्योंकि यह विधेयक पहले ही 2019 में लोकसभा से पारित हो चुका है।
नगवां बांध के 11 में से आठ फाटक खुले
- फोटो : अमर उजाला
राष्ट्रीय समिति के गठन का प्रस्ताव
विधेयक के प्रावधान के मुताबिक बांधों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय समिति का गठन किया जाएगा। जिसका कार्यकाल तीन साल का होगा और जिसमें केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष, संयुक्त सचिव के रैंक में केंद्र सरकार के अधिकतम 10 प्रतिनिधि, राज्य सरकारों के अधिकतम सात प्रतिनिधि और तीन विशेषज्ञ शामिल किए जाएंगे।
एक राज्य बांध सुरक्षा संगठन भी बनाया जाएगा, जो बांध सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होगा। इस संगठन को बांधों, जलाशयों के डिजाइन, निर्माण, मरम्मत और विस्तार की विभिन्न योजनाओं की उचित समीक्षा और अध्ययन के लिए डेटा की जांच और उसके संग्रह करने का अधिकार होगा।
राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण का मुख्यालय दिल्ली में होगा। बांध इंजीनियरिंग और बांध सुरक्षा प्रबंधन से संबंधित समस्याओं से निपटने के लिए भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव के पद से नीचे के अधिकारी की अध्यक्षता में इसका नेतृत्व किया जाएगा। किसी बांध के टूटने जैसी घटनाओं के बारे में राज्य बांध सुरक्षा संगठन को राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण को रिपोर्ट करना होगा चाहिए और प्रत्येक बांध की प्रमुख घटनाओं का रिकॉर्ड भी बनाए रखना होगा।
एम॰ के॰ स्टालिन
- फोटो : सोशल मीडिया
तमिलनाडु की आपत्ति क्या है?
बांध सुरक्षा अधिनियम के विचार का विरोध कर रहे मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने बांध सुरक्षा कानून का विरोध कर रहे हैं। यह विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने अपने एक बयान में राज्यों के हितों का ध्यान नहीं रखने का केंद्र सरकार पर आरोप लगाया। उनके बयान के मुताबिक यह विधेयक संघीय सिद्धांतों और राज्य सरकारों की शक्तियों के लिए नुकसानदायक है। स्टालिन ने कहा कि यह कदम सत्तावाद के अलावा और कुछ नहीं है और लोकतांत्रिक-संसदीय लोकाचार या भारत के संविधान की परवाह किए बिना राज्य सरकारों के अधिकारों को छीन लिया गया है।
विपक्षी दल एआईडीएमके ने भी विधेयक पर सरकार के रुख का समर्थन किया है। किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले राज्यों से उचित विचार-विमर्श की मांग करते हुए तमिलनाडु विधानसभा ने कुछ समय पहले इस संबंध में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था।
जयललिता
तमिलनाडु के राजनीतिक दल और राज्य सरकार कई कारणों से इस विधेयक का विरोध कर रहे थे। उनका आरोप है कि इसमें ऐसे खंड शामिल हैं जो राज्य के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, खासकर पड़ोसी राज्यों में बनाए गए बांधों, रखरखाव और संचालन में समस्याएं पैदा होंगी। राज्य की मुख्य चिंता बांधों को नियंत्रित करने में अपनी शक्ति और स्वायत्तता बनाए रखने में है। 2016 में जब विधेयक पर राज्यों से फीडबैक लिए जा रहे थे तब तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता ने राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण के बारे में बात करने वाले खंड को लेकर सवाल उठाए थे।
ज्यादतर बांधों का निर्माण और रखरखाव राज्यों के जिम्मे
भारत में ज्यादतर बांधों का निर्माण और रखरखाव राज्य सरकारें करती हैं। जबकि कुछ बड़े बांधों का प्रबंधन जैसे दामोदर घाटी निगम या भाखड़ा-नंगल परियोजना का भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड जैसे स्वायत्त निकायें करती हैं। भारत में 5,200 से अधिक बड़े बांधों और अभी करीब 450 निर्माणाधीन बांधों को लेकर ही बांध सुरक्षा विधेयक, 2018 पेश किया गया था। 2010 में इस विधेयक को लाने की बात कही गई थी और अगस्त 2019 में लोकसभा से पास हुआ।