मालदीव में इस समय राजनीतिक अशांति का माहौल है। वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को मानने से इंकार कर दिया है जिसमें उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद सहमति सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का आदेश दिया था। यामीन ने देश में आपातकाल लगाने के अलावा कोर्ट के जजों को गिरफ्तार कर लिया है। जिसके बाद पूर्व राष्ट्रपति ने भारत से मदद की अपील की थी। इसके बाद यामीन सरकार ने विशेष दूत बनाकर विदेश मंत्री मोहम्मद असीम को भारत से मदद मांगने के लिए भेजा था। जिसके जरिए उन्होंने भारत के साथ अपने बिगड़े हुए संबंधों को सुधारने की कोशिश करने का दिखावा किया था।
दिखावा इसलिए क्योंकि यह बात बहुत कम ही लोगों को पता होगी कि भारत और मालदीव के रिश्ते तब बिगड़ गए थे जब यामीन सरकार ने भारतीयों की चिंताओं के प्रति अपनी जवाबदेही खत्म कर दी थी। तब भारतीय सिस्टम में किसी ने इस मामले पर कुछ नहीं कहा था क्योंकि यह साफ हो गया था कि मालदीव के लिए इंडिया फर्स्ट अब चाइना फर्स्ट में बदल गया है। यहां यह बताना जरूरी है कि राष्ट्रपति यामीन चीन को मालदीव नहीं लाए थे बल्कि इसका श्रेय पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद को जाता है। जिन्होंने साल 2011 में चीन को माले में अपना दूतावास खोलने की इजाजत दी थी।
नाशीद ने भारत की जायज चिंताओं को दरकिनार करते हुए मालदीव में चीन की आर्थिक मौजूदगी के लिए रास्ते खोल दिए थे। हालांकि यामीन ने चीन के साथ संबंधों को एक नया आयाम देने का काम जरूर किया और उनके मन में इस दौरान भारत के प्रति अविश्वास भी बढ़ा। भारत के नजरिए से देखा जाए तो यामीन ने संबंधों की रेखा उस समय पार कर दी थी जब दिसंबर 2017 में उन्होंने चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन किया था। इस एग्रीमेंट को जल्दबाजी में साइन किया गया था। सांसदों को केवल 15 मिनट में इस डील को पढ़कर अप्रूव करने का समय दिया गया।
चीन के साथ डील करने से पहले मालदीव ने साल 1981 में भारत के साथ एक विशेष व्यापार संधि साइन की थी। जिसके अनुसार भारत मालदीव को जरूरत की सारी चीजें, एग्रीगेट और रेत की सप्लाई करेगा। वहीं मालदीव अपने देश में बनी किसी भी चीज को बिना किसी रुकावट के भारत को बेच सकता है। यह व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही थी। मगर केंद्र का मानना है कि चीन के साथ की गई संधि के जरिए मालदीव ने भारत पर निशाना साधा है।