महाराष्ट्र के ठाणे की एक अदालत ने साल 2008 के दंगा और मारपीट के मामले में 21 लोगों को बरी कर दिया है। इस मामले में दही हांडी उत्सव के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया था। इसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे। उनके वाहनों को भी नुकसान पहुंचाया गया था।
दही हांडी के दौरान क्यों हुआ था विवाद?
यह घटना उसी साल 25 अगस्त को हुई थी। ठाणे के टेंभी नाका और टावर नाका में दही हांडी का उत्सव चल रहा था। इस दौरान जय जवान गोविंदा ग्रुप (जोगेश्वरी) और माझगांव गोविंदा ग्रुप के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। देखते ही देखते दोनों समूहों के बीच झड़प शुरू हो गई। इस दौरान पत्थर और बोतलें फेंकी गईं।
हालात बिगड़ते देख निरीक्षक रामदास हरिलाल राठौड़ के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दखल दिया। लेकिन दोनों समूहों ने पुलिस टीम पर ही हमला कर दिया। इसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। पुलिस के वाहनों में भी तोड़फोड़ की गई।
पुलिस ने किन धाराओं में दर्ज किया था मामला?
इस घटना के बाद ठाणे नगर थाने में मामला दर्ज किया गया था। इसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की कई धाराएं लगाई गई थीं। इनमें सरकारी कर्मचारी पर हमला, दंगा, गैरकानूनी तरीके से भीड़ जुटाना और अन्य अपराध शामिल थे। इस मामले में आखिरकार साल 2025 में आरोप तय किए गए।
अदालत ने 21 आरोपियों को क्यों किया बरी?
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पंकज ए. पाटकी ने शनिवार को अपना आदेश सुनाया। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपियों ने पुलिसकर्मियों को उनकी ड्यूटी करने से रोका था। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष के लिए यह साबित करना जरूरी था कि आरोपियों ने एक साझा मकसद से गैरकानूनी जमावड़ा बनाया था। लेकिन ऐसा साबित नहीं हो सका।
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मामले में गवाहों की कमी कैसे बनी वजह?
अभियोजन पक्ष ने इस मामले में चार गवाहों से पूछताछ की थी। हालांकि, शिकायतकर्ता निरीक्षक रामदास हरिलाल राठौड़ अदालत में पेश नहीं हो सके। उनका पता नहीं चल पा रहा था। वहीं, कई अन्य गवाहों की मौत हो चुकी थी।
अदालत ने क्या कहा?
न्यायाधीश ने एक और अहम बात पर ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी ने खुद माना था कि घटना के समय मौके पर 1,000 से ज्यादा लोग जमा थे। ऐसे में आरोपियों की पहचान साबित करना बेहद जरूरी था। अदालत ने कहा कि घायल पुलिसकर्मियों ने आरोपियों की मौके पर मौजूदगी या घटना में उनकी भूमिका के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। आखिरकार, सबूतों की कमी के कारण अदालत ने सभी 21 आरोपियों को बरी कर दिया।