देश में मुंह का कैंसर समय के साथ आर्थिक बोझ का कारण बनता जा रहा है। टाटा मेमोरियल सेंटर द्वारा किए गए एक शोध से पता चला है कि देश में मुंह के कैंसर के इलाज के लिए वर्ष 2020 में कुल 2,386 करोड़ रुपये की राशि खर्च हुई है।
टाटा मेमोरियल सेंटर के निदेशक डॉ. आरए बडवे ने बताया कि ग्लोबोकैन के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो दशकों में नए मामलों की निदान दर में 68 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मुंह के कैंसर के 60 से 80 फीसदी मामले बढ़ी हुई अवस्था में डॉक्टरों के पास पहुंचते हैं। वर्ष 2020 में करीब 2,386 करोड़ रुपये खर्च हुए जो सरकार द्वारा जारी किए गए स्वास्थ्य बजट का एक अहम हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार अगले दस वर्षों में देश पर 23,724 करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ पड़ेगा।
गंभीर होने पर चलता है रोग का पता
डॉ. बडवे के अनुसार अधिकतर लोगों को इस बीमारी के बारे में तब पता चलता है जब स्थिति बिगड़ चुकी होती है। वहीं कुछ मरीजों को समय पर इलाज तक नसीब नहीं हो पाता है। मुंह के कैंसर की पहचान समय पर हो और गंभीर श्रेणी के रोग में केवल 20 फीसदी की कमी हो तो 250 करोड़ रुपये बच सकते हैं।
जांच पर भी बड़ी रकम खर्च
मुह के कैंसर के इलाज पर होने वाले खर्च के लिए डॉ. पंकज चतुर्वेदी की अध्यक्षता में टाटा मेमोरियल सेंटर ने विश्लेषण शुरू किया। अस्पताल में रिसर्च फेलो और शोध के प्रमुख लेखक डॉ. अर्जुन सिंह ने पाया कि उन्नत चरणों के इलाज की लागत 2,02,892 रुपये थी जबकि प्रारंभिक चरण की लागत 1,71,135 रुपये थी। सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी जांचों के साथ कीमोथेरेपी पर भी बड़ी रकम खर्च हुई।