तमिलनाडु की सियासत में करुणानिधि ने मजबूती से बोए थे हिंदू, हिंदी, संस्कृत विरोधी बीज
सियासी जानकारी और सेंटर फॉर जियोपोलिटकल स्टडीज एंड रिसर्च के प्रोफेसर एनएम स्वामी कहते हैं जो लोग तमिलनाडु की सियासत से वाकिफ होंगे उनको उदयनिधि का यह बयान बिल्कुल चौंकाने वाला नहीं लग रहा होगा। स्वामी कहते हैं कि तमिलनाडु की सियासत में डीएमके की मजबूती प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के जमाने में हिंदू हिंदी संस्कृत और देवी देवताओं के अस्तित्व पर उठाए जाने सवाल के साथ ही होती रही। वह कहते हैं कि एक दौर में एम करुणानिधि ने मद्रास स्टेट में हिंदी विरोध को इतना ज्यादा तूल दिया कि उसको तमिल अस्मिता से जोड़ा जाने लगा। नतीजा हुआ कि समूचे तमिलनाडु में न सिर्फ हिंदी बल्कि हिंदू संस्कृति और देवी देवताओं की अस्मिता पर सवाल उठाए जाने को इतना समर्थन मिलना शुरू हुआ कि इसकी अगुवाई करने वाले करुणानिधि प्रदेश के बड़े नेता के तौर पर पहचाने जाने लगे। प्रोफेसर स्वामी कहते हैं कि तमिलनाडु की सियासत में खुद को राजनीतिक तौर पर मजबूत करने और अपनी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए करुणानिधि ने हिंदी विरोधी दिवस तक का आयोजन कर डाला था।
राम की अस्मिता पर उठाए थे करुणानिधि ने सवाल
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि अपनी पार्टी की हिंदू हिंदी संस्कृत और देवी देवताओं को न मानने वाली राजनीतिक विचारधारा को इतना मजबूती के साथ आगे बढ़ा रहे थे कि उनको इसमें हमेशा सियासी फायदा ही नजर आता था। सेंटर फॉर जियोपोलिटिकल स्टडीज एंड रिसर्च के प्रोफेसर स्वामी कहते हैं कि एक बार तो सियासत में एम करुणानिधि ने भगवान राम पर ही सवाल उठाते हुए एक जनसभा में पूछ लिया था कि रामसेतु का निर्माण आखिर राम कैसे कर सकते थे। उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुए पूछा था कि क्या राम कोई इंजीनियर थे। वह भगवान राम के अस्तित्व पर भी सवाल उठा चुके थे। प्रोफेसर स्वामी कहते हैं कि साठ के आखिरी के दशक में करुणानिधि ने हिंदी का इस कदर तमिलनाडु में विरोध किया कि कांग्रेस को सत्ता से बेदखना होना पड़ा। तमिलनाडु में हालात इस कदर एम करुणानिधि के पक्ष में आए कि सरकारी स्कूलों से लेकर बैंक अस्पताल और सरकारी दफ्तर तक में हिंदी पूरी तरीके से प्रतिबंधित हो चुकी थी। करुणानिधि की तब तक राज्य में हिंदू हिंदी और देवी देवताओं के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाने से राज्य में उनकी इतनी स्वीकार्यता बढ़ी कि 3 फरवरी 1969 को मुख्यमंत्री अन्नादुरई के निधन के बाद वह पार्टी के नेता बनाए गए और बाद में मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ली।
विरासत की सियासत को आगे बढ़ा रहे उदयनिधि
तमिलनाडु की राजनीति को समझने वालों का कहना है कि जिस तरीके की सियासत एम करुणानिधि ने की उसी तरीके की सियासत तो उनके बेटे एमके स्टालिन ने भी नहीं की। वरिष्ठ पत्रकार के सुदर्शन कहते हैं कि करुणानिधि के पोते और मुख्यमंत्री उनके स्टालिन के पुत्र उदयनिधि स्टालिन जरूर अपने बाबा के पद चिन्हों पर आगे बढ़ रहे हैं। वह कहते हैं कि जिस तरीके से मंत्री उदयनिधि ने सनातन धर्म पर बयान दिया है वह तमिलनाडु की राजनीति खासतौर से उनकी पार्टी से जुड़ी हुई विचारधारा और विरासत की सियासत का एक अहम अंश माना जा रहा है। सुदर्शन कहते हैं कि यह बात अलग है कि अब जब देशभर के सभी विपक्षी दल INDIA के साथ जुड़कर भारतीय जनता पार्टी का सामना कर रहे हैं तो गठबंधन में शामिल किसी भी राजनीतिक दल की इस तरीके से विवादित टिप्पणी न सिर्फ गठबंधन को मुसीबत में डाल सकती है बल्कि उत्तर भारत के राज्यों में समूचे गठबंधन को इस मामले में अपना रूख स्पष्ट करने के लिए मजबूर भी कर सकती है।
INDIA से ज्यादा तमिलनाडु को तवज्जो दी उदयनिधि में
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन ने भविष्य के लिहाज से तमिलनाडु में एक बार अपने बाबा एम करुणानिधि के पदचिन्हों पर चलते हुए वहीं सियासी दांव खेला है जिसको कि वह 1960 हो 70 के दशक में आजमाते आए थे। वरिष्ठ पत्रकार के सुदर्शन कहते हैं कि जिस तरीके से तमिलनाडु की सियासत में डीएमके की नीव पड़ी है उसको उदयनिधि फिलहाल कमजोर नहीं होने देना चाहते हैं। उनका कहना है कि सियासी गठबंधन कब तक चलेगा इसका किसी को कोई भी अंदाजा नहीं है। शायद यही वजह रही उदयनिधि ने गठबंधन के बाद के सियासी भविष्य को देखते हुए अपनी पार्टी की मजबूती के लिए उसी दांव को खेला जो उनके बाबा एम करुणानिधि आजमाते थे। हालांकि राजनीतिक जानकार बताते हैं एम करुणानिधि ने अपने जीवन के आखिरी के 10 सालों में ताउम्र की जाने वाली तल्खभरी सियासत की आवाज को धीरे-धीरे कम करना शुरू कर दिया था। लेकिन पूरी जिंदगी एम करुणानिधि और उनकी पार्टी की सियासत का बड़ा आधार हिंदी, हिंदू ,संस्कृत और देवी देवताओं के अस्तित्व पर सवाल उठाते ही चलता रहा।