स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने शंकरी प्रसाद (1951) और सज्जन सिंह (1965) जैसे मामलों में निर्णय देते हुए संसद को संविधान में संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्रदान की। इसका कारण यह माना जा सकता है कि स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पर विश्वास जताया क्योंकि उस वक्त प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी ही आमतौर पर संसद सदस्यों के रूप में सेवा कर रहे थे। इसके बाद गोलकनाथ (1967) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद अनुच्छेद-368 के तहत मौलिक अधिकारों को समाप्त या सीमित करने की शक्ति नहीं रखती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तब आया जब सत्तारूढ़ सरकारों ने अपने राजनीतिक हितों के लिए संविधान में संशोधन करना शुरू कर दिया था। 1970 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा आरसी कूपर (1970), माधवराव सिंधिया (1970) आदि मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णयों को बदलने के लिए 24, 25, 26 और 29वें संशोधनों में व्यापक बदलाव किए गए।
इन संशोधनों के जरिए इंदिरा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने के निर्णय को अवैध घोषित करने व पूर्व शासकों को दी जाने वाली ‘प्रिवी पर्स’ को समाप्त करने संबंधी संशोधन को अवैध घोषित करने के निर्णय को पलट दिया।
केशवानंद भारती ने न केवल केरल भूमि सुधार अधिनियम को चुनौती दी थी बल्कि 24, 25, 26 और 29वें संविधान संशोधनों व गोलकनाथ मामले के निर्णय को चुनौती दी थी। केशवानंद ने चूंकि गोलकनाथ मामले में 11 जजों की पीठ द्वारा दिए गए निर्णय को भी चुनौती दी गई थी, इसलिए इस मामले में सुनवाई के लिए तत्कालीन चीफ जस्टिस एसएम सीकरी की अध्यक्षता वाली 13 जजों की पीठ का गठन किया गया।
गौरतलब है कि उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में 13 जज ही थे। सभी के सभी जजों को इसमें शामिल किया गया। केशवानंद व अन्य वादियों की ओर से नानी पालखीवाला, फली नरीमन, सोली सोराबजी आदि कानूनविदों ने बहस की थी।
यह था सुप्रीम कोर्ट का फैसला
यह ऐसा मामला था कि 13 जजों की संविधान पीठ के सदस्यों के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद देखने को मिले। आखिरकार 24 अप्रैल 1973 को चीफ जस्टिस सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने बहुमत (7-6) से निर्णय दिया कि संसद को संविधान के मूलभूत संरचना में बदलाव करने से रोका जाना चाहिए। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया अनुच्छेद-368 जो संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्तियां प्रदान करता है, के तहत संविधान की मूलभूत संरचना में बदलाव नहीं किया जा सकता है।
क्या है मूलभूत संरचना
केशवानंद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मूलभूत संरचना को परिभाषित तो नहीं किया लेकिन यह माना गया कि संघवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र आदि ‘मूलभूत संरचना’ हैं। इसके बाद से न्यायालय ने इस सूची का निरंतर विस्तार किया है।
मूलभूत संरचना के रूप में सूचीबद्ध चीजें
- संविधान की सर्वोच्चता
- विधि का शासन
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता
- शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत
- संघवाद
- धर्मनिरपेक्षता
- संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य
- संसदीय प्रणाली
- स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव
- कल्याणकारी राज्य
किसी भी देश का संविधान उस देश के मौलिक नियमों का दस्तावेज होता है। इन दस्तावेज के आधार पर ही अन्य सभी कानून बनाए तथा लागू किए जाते हैं। संविधान के कुछ भागों को अन्य प्रावधानों की तुलना में विशेष दर्जा दिया जाता है तथा संविधान के ये भाग व्यापक संविधान संशोधनों से संविधान की रक्षा करते हैं।
मूलभूत संरचना के महत्व को एसआर बोम्मई (1994) मामले से समझा जा सकता है। बाबरी विध्वंस के बाद राष्ट्रपति द्वारा भाजपा सरकारों की बर्खास्तगी को बरकरार रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन सरकारों की बर्खास्तगी धर्मनिरपेक्षता के लिए आवश्यक है।
यहीं नहीं खत्म हुई थी न्यायपालिका और सरकार की तनातनी
तत्कालीन चीफ जस्टिस एसएम सीकरी ने सेवानिवृत्ति के ठीक एक दिन पहले यानी 24 अप्रैल 1973 को बहुमत के आधार पर यह फैसला किया था। चीफ जस्टिस भी बहुमत का हिस्सा थे। यह वह फैसला था जिसने सरकार को कहीं न कहीं धक्का पहुंचाया था।
शायद यही वजह थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 अप्रैल 1973 को परंपरा से हटकर वरिष्ठतम जज को चीफ जस्टिस बनाने की जगह जस्टिस एएन रे को चीफ जस्टिस बनाने का निर्णय लिया। जस्टिस एएन रे, केशवानंद भारती मामले की पीठ का हिस्सा थे और उनका मत बहुमत की राय से उलट था।
कहानी यहीं पर नहीं थमी
1975 में तत्कालीन चीफ जस्टिस एएन रे ने केशवानंद भारती के मामले पर पुनर्विचार करने की भी कोशिश की। उन्होंने बाकायदा 13 सदस्यीय पीठ का गठन किया। पुनर्विचार की कार्यवाही भी शुरू हुई लेकिन दो दिन हुई सुनवाई में पालकीवाला आदि न्यायविदों के कठोर विरोध के बाद इस पीठ को भंग करने पड़ा। पालकीवाला का कहना था कि बगैर पुनर्विचार याचिका दायर हुए पुनर्विचार नहीं किया जा सकता।
क्यों पहुंचे केशवानंद कोर्ट
भारत के न्यायिक इतिहास में केशवानंद भारती नाम अमर है और वह भी एक वादी के तौर पर। केशवानंद दक्षिण भारत के बहुत बड़े संत थे। उन्हें केरल का शंकराचार्य कहा जाता था। केरल में कासरगोड़ नामक एक जिला है। कर्नाटक से सटे इस जगह पर सदियों पुराना एक शैव मठ है, जो एडनीर में स्थित है।
यह मठ महान संत व अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रणेता आदिगुरु शंकराचार्य से जुड़ा हुआ है। शंकराचार्य के चार शुरुआती शिष्यों में से एक तोतकाचार्य थे जिनकी परंपरा में यह मठ स्थापित हुआ था। माना जाता है कि इस मठ का इतिहास करीब 1200 वर्ष पुराना है। केरल और कर्नाटक में इसका काफी सम्मान है।
शंकराचार्य की क्षेत्रीय पीठ का दर्जा प्राप्त होने के चलते इस मठ के प्रमुख को ‘केरल का शंकराचार्य भी कहा जाता है। केशवानंद भारती ने महज 19 वर्ष की आयु में संन्यास ले लिया था। कुछ वर्ष बाद गुरु के निधन की वजह से केशवानंद एडनीर मठ के मुखिया बन गए। पिछले 57 सालों से वह इस पद पर बने हुए थे। केशवानंद को श्रीमत् जगदगुरु श्रीश्री शंकराचार्य तोतकाचार्य श्री केशवानंद भारती श्रीपदगवरु के संबोधन से बुलाया जाता था।
एडनीर मठ का न केवल अध्यात्म के क्षेत्र में बल्कि नृत्य, कला, संगीत और समाज सेवा में भी बड़ा योगदान है। भारत की नाट्य और नृत्य परंपरा को बढ़ावा देने के लिए एडनीर मठ के कई स्कूल और कॉलेज चल रहे हैं। इसके अलावा यह मठ सालों से कई तरह के व्यवसायों को भी संचालित करता है। सत्तर के दशक के आसपास कासरगोड़ में इस मठ के पास हजारों एकड़ जमीन थी। 1972 में केरल भूमि सुधार अधिनियम आया।
समाज से आर्थिक विषमताओं को कम करने के मकसद से लाए गए इस कानून के तहत जमींदारों और मठों के पास मौजूद हजारों एकड़ की जमीन अधिगृहीत कर ली गई। इसमें एडनीर मठ की भी संपत्तियां थी। मठ की सैकड़ों एकड़ जमीन को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद एडनीर मठ प्रमुख स्वामी केशवानंद भारती ने सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में दायर याचिका में केशवानंद भारती ने अनुच्छेद 26 का हवाला देते हुए मांग की थी कि उन्हें धार्मिक संपदा का प्रबंधन करने का मूल अधिकार दिया जाए। उन्होंने संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद-31 में प्रदत्त संपत्ति के मूल अधिकार पर पाबंदी लगाने वाले केंद्र सरकार के 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधनों को चुनौती दी थी। इसके अलावा केरल और केंद्र सरकार के भूमि सुधार कानूनों को भी उन्होंने चुनौती दी। लेकिन केरल हाईकोर्ट में केशवानंद को सफलता नहीं मिली जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।