गैर पंजीकृत गोशालाओं की रिपोर्ट भी इससे अलग नहीं है। बरसाना में संत रमेश बाबा की माताजी गोशाला देश की सबसे बड़ी गोशालाओं में एक है। इसमें करीब 55 हजार गायें हैं। गोसेवा के लिए रमेश बाबा को 2019 में पद्मश्री भी मिल चुका है। गोशाला में करीब 300 कार्यकर्ता हैं और करीब एक हजार लोग गोशाला के गुरूकुल और आश्रम में रहते हैं।
इस सर्वे से बाहर की एक बड़ी गोशाला के संचालक राधाकान्त शास्त्री कहते हैं कि हमें भी हैरत हुई की कोराना प्रकोप काल में भी हमारे आश्रम में किसी को कोरोना क्या मामूली बुखार या खांसी तक नहीं हुई। वे कहते हैं- 'दरअसल मुझे लगता है कि गोशालाओं में पंचगव्यों की तेज गंध सारे बैक्टीरिया और वायरस को खत्म कर देती है। इसकी वजह से यहां की बसाहट पर कोरोना वायरस सोर्स कोव-2 का असर नहीं होता या वायरस इस वातावरण में निष्क्रिय हो जाता है। कुछ तो है जिसका वैज्ञानिक परीक्षण होना चाहिए।'
90 साल के सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट लाल बहादुर सिंह आजमगढ़ के रहने वाले हैं। उनके घर में तीन-चार गायें हमेशा रही हैं। उनके इलाके में जब कोविड का प्रकोप फैला तो केवल उन्हीं घर संक्रमण से बच गया। उन्होंने इसे गोवंशीय का प्रताप माना। उन्होंने अपने स्तर पर आजमगढ़ की गोशालाओं में सर्वे कराया तो उन्हें भी गोशालाओं में कोविड संक्रमण का एक भी मामला नहीं मिला। उनके लिए ये हैरत की बात थी। उन्होंने 'अमर उजाला' को बताया कि पिछले महीने वे मथुरा गए। वहां उनकी कुछ संतों और सरकारी अधिकारियों के साथ इस पर अनौपचारिक चर्चा हुई। यहां बृज विकास बोर्ड का उपाध्यक्ष और पूर्व आईपीएस एसके मिश्र, सीडीओ नितिन गौर आदि भी मौजूद थे। इन्हीं अफसरों की पहल पर ही ये सर्वे हुआ। प्रारंभिक नतीजों के बाद इस पर अब और काम करने की जरूरत है। सिंह ने कहा कि इस तरह का सर्वे राज्य की सभी गोशालाओं में कराना चाहिए तब शायद हम किसी निश्चित और ठोस नतीजे पर पहुंचने की हालत में हों। वे कहते हैं कि पंचगव्यों के औषधीय गुणों और उससे जुड़े चिकित्सा लाभों पर गहन शोध की आवश्यकता है।
इस दिशा में कर सकते हैं अभी और काम
इस सर्वे में मथुरा की गोशालाओं में हमें कोई कोविड पॉजिटिव मरीज नहीं मिला है। ये कोविड चिकित्सा वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय हो सकता है। अन्य जिलों की गोशालाओं में भी वैज्ञानिक ढंग से सर्वे कराके इस दिशा में आगे काम किया जा सकता है। -नितिन गौर, मुख्य विकास अधिकारी, मथुरा