गुलमोरा का जीवन 6 महीने पहले बदला जब वह अपोलो डॉक्टरों द्वारा सिरमोरा में लगाए गए मेडिकल कैंप में गईं। उन्होंने कहा कि इसके कुछ दिनों बाद उन्हें भारत से डॉक्टों का फोन आया। जिसके बाद वह एक दुभाषिया की मदद से 26 मई को भारत आईं। गुलमोरा के माता पिता की एक छोटी सी दुकान है। भारत आने का उनका सारा खर्च ताशकंद के एक समाज सेवी ने उठाया। जिसके बाद 31 जून को उनकी सर्जरी हुई जिसमें महज 2 घंटे का समय लगा।
इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल की डॉक्टर शाहीन नूरेजहां का कहना है कि गुलमोरा दुभाषिया के साथ क्लीनिक आईं तो उन्होंने उसे बैठने को कहा। लेकिन उसने मना कर दिया। वह पिछले 32 सालों से नहीं बैठी थीं।
नूरेजहां ने कहा कि जब उन्होंने उसके घाव देखे तो वह हैरान थीं कि कोई इतने बड़े घावों के साथ कैसे जीवित रह सकता है। यह सर्जरी ज्यादा जटिल नहीं थी। अब उनके घाव भरने शुरू हो गए हैं और अगले 6 महीनों बाद वह टाइट कपड़े भी पहन पाएंगी। अब उन्हें सितंबर को दोबारा बुलाया गया है ताकि उनके घावों में आए सुधार को देखा जा सके।