सूरत की एक अदालत ने गुरुवार को गुजरात सरकार की उस अर्जी को मंजूरी दे दी, जिसमें वर्ष 2015 के पाटीदार आरक्षण आंदोलन से जुड़े देशद्रोह के मामले को वापस लेने की मांग की गई थी। यह मामला भाजपा विधायक हार्दिक पटेल और उनके तीन सहयोगियों के खिलाफ दर्ज था। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश आर.ए. त्रिवेदी की अदालत ने सरकार की अर्जी स्वीकार करते हुए हार्दिक पटेल, उनके तत्कालीन सहयोगी अल्पेश कथीरिया, विपुल देसाई और चिराग देसाई के खिलाफ मामला वापस लेने का आदेश दिया। इसके साथ ही चारों को इस केस में बरी कर दिया गया।
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अक्तूबर 2015 में दर्ज किया गया था केस
यह देशद्रोह का मामला अक्तूबर 2015 में सूरत के अमरोली पुलिस थाने में दर्ज किया गया था। उस समय हार्दिक पटेल पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पीएएएस) के संयोजक थे। उन पर आरोप था कि उन्होंने कथित रूप से भड़काऊ बयान देकर पाटीदार युवाओं को हिंसा के लिए उकसाया। इस मामले में उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 124-ए (देशद्रोह), 115 (अपराध के लिए उकसाना) और 201 (सबूत मिटाना) लगाई गई थीं।
सरकार ने पहले ही 90 फीसदी केस वापस लेने का किया फैसला
सरकारी वकील की ओर से दलील दी गई कि राज्य सरकार पहले ही पाटीदार आंदोलन से जुड़े करीब 90 प्रतिशत मामलों को वापस लेने का फैसला कर चुकी है, जिसमें देशद्रोह के मामले भी शामिल हैं। इसी आधार पर यह अर्जी दाखिल की गई थी। गौरतलब है कि इससे पहले मार्च 2025 में अहमदाबाद की एक सत्र अदालत ने भी 2015 के आंदोलन से जुड़े एक अन्य देशद्रोह मामले को वापस लेने की अनुमति दी थी।
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हार्दिक पटेल ने 2019 में कांग्रेस ज्वाइन की थी और 2020 में उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था। बाद में 2022 में वे भाजपा में शामिल हुए और उसी साल विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने। अदालत के ताजा फैसले के बाद 2015 के पाटीदार आंदोलन से जुड़े मामलों को लेकर चल रही कानूनी कार्रवाई से जुड़ा केस खत्म हो गया है।
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