सुप्रीम कोर्ट उस जनहित याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया, जिसमें केंद्र को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की अधिक न्यायसंगत व्यवस्था के लिए नीतियां बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने रमाशंकर प्रजापति और यमुना प्रसाद द्वारा दायर जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर 10 अक्तूबर तक जवाब मांगा। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वे भारी विरोध का सामना करने के लिए तैयार रहें क्योंकि इस जनहित याचिका के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।
याचिका में कहा गया है कि यह दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 को मजबूत करेगा और मौजूदा कोटा में बदलाव किए बिना समान अवसर सुनिश्चित करेगा। याचिका में कहा गया है, दशकों से आरक्षण के बावजूद, आर्थिक रूप से सबसे वंचित लोग अक्सर पीछे छूट जाते हैं और आरक्षित श्रेणियों के अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले लोग लाभ प्राप्त करते हैं। आय के आधार पर प्राथमिकता देने से यह सुनिश्चित होगा कि मदद वहीं से शुरू हो जहां इसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है। अनुसूचित जाति (एससी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणियों से संबंधित दोनों याचिकाकर्ता, इस याचिका के माध्यम से इन समुदायों के भीतर आर्थिक असमानताओं को उजागर करना चाहते हैं, जिसके कारण मौजूदा आरक्षण नीतियों के तहत लाभों का असमान वितरण हुआ है।
याचिका में तर्क दिया गया कि आरक्षण की रूपरेखा वंचित समुदायों के उत्थान के लिए बनाई गई थी। लेकिन वर्तमान प्रणाली इन समूहों के अपेक्षाकृत समृद्ध आर्थिक स्तर और उच्च सामाजिक स्थिति वाले पृष्ठभूमि वाले लोगों को ही लाभ पहुंचाती है। इससे आर्थिक रूप से सबसे वंचित सदस्यों की अवसरों तक पहुंच सीमित हो जाती है।
याचिका में कहा गया है, आरक्षण नीति में आर्थिक मानदंडों को शामिल करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लाभ उन लोगों को मिले जिन्हें वास्तव में राज्य सहायता की आवश्यकता है। इस सुधार प्रस्ताव का उद्देश्य जाति-आधारित आरक्षण को समाप्त या कमजोर करना नहीं, बल्कि उन्हें उनके इच्छित उद्देश्य को और अधिक प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए परिष्कृत करना है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आरक्षण के अंतर्गत आय के आधार पर आरक्षण को प्राथमिकता देना शुरू किया जाना चाहिए। इससे इन समुदायों के सबसे वंचित व्यक्तियों के लिए अवसरों के द्वार खुलेंगे।