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Supreme Court Updates: सत्येंद्र जैन की अंतरिम जमानत बढ़ी; मणिपुर की पत्रकार के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही नहीं

Mon, 04 Dec 2023 04:23 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को कई अहम मामलों की सुनवाई हुई। इसमें एक मामला आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन का है। मनी लॉन्ड्रिंग के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जैन की अंतरिम जमानत बढ़ाने का फैसला लिया है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सत्येंद्र जैन की अंतरिम जमानत 11 दिसंबर तक बढ़ाने का फैसला लिया है। अदालत ने धन शोधन (Money Laundering) मामले में दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सत्येन्द्र कुमार जैन की अपील पर अंतरिम जमानत अवधि बढ़ाने का फैसला लिया। जैन ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली उच्च न्यायालय के 6 अप्रैल के आदेश को चुनौती दी थी।
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जैन की याचिका पर शीर्ष अदालत ने उन्हें राहत दी। दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपील पर जैन को राहत नहीं मिली थी और अदालत ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बता दें कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के सिलसिले में जैन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं।

गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने करीब साढ़े छह महीने पहले, विगत 26 मई को सत्येंद्र जैन को राहत दी थी। अदालत ने चिकित्सा आधार पर छह सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत दी थी। बाद में कोर्ट ने जैन को और राहत देते हुए अंतरिम जमानत की अवधि आगे बढ़ाने का फैसला सुनाया।
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सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ में सत्येंद्र जैन की तरफ से पेश वकील ने कहा, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति त्रिवेदी की विशेष पीठ ने इस मामले में दलीलें सुन चुकी है। जैन के वकील ने अपनी अपील में कहा, पीठासीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति बोपन्ना सोमवार को उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए मामले को किसी अन्य तारीख पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।

इस पर न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने कहा, हमें यह देखना होगा कि अंतरिम आदेश को बरकरार रखा जाए या नहीं, क्योंकि अंतरिम जमानत इतने लंबे समय जारी नहीं रखा जा सकता है। अदालत की टिप्पणी के बाद जैन के वकील ने पीठ से मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की अपील दोहराई। पीठ ने मामले की सुनवाई 11 दिसंबर तक के लिए स्थगित करते हुए कहा, अगली सुनवाई तक सुप्रीम कोर्ट से पारित अंतरिम आदेश जारी रहेगा।

गौरतलब है कि ईडी ने जैन की जमानत का विरोध करते हुए दावा किया था। ईडी का दावा है कि आप नेता सत्येंद्र जैन निचली अदालत में इस आधार पर बार-बार स्थगन की मांग कर रहे थे कि उनकी जमानत याचिका शीर्ष अदालत में लंबित है। मामले की सुनवाई जानबूझकर लंबित रखने का आरोप लगाते हुए जांच एजेंसी ने आरोप लगाया कि जैन ने ट्रायल कोर्ट से 16 तारीखें ली हैं।

बता दें कि शीर्ष अदालत ने करीब साढ़े छह महीने पहले- 26 मई को जैन को चिकित्सा आधार पर छह सप्ताह की अंतरिम जमानत देते हुए कहा था कि एक नागरिक को अपने खर्च पर निजी अस्पताल में अपनी पसंद का इलाज कराने का अधिकार है।

ईडी ने कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप के तहत जैन को पिछले साल 30 मई को गिरफ्तार किया था। सत्येंद्र जैन पर खुद से जुड़ी चार कंपनियों के माध्यम से धन शोधन के आरोप लगे हैं। ईडी ने जैन को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 2017 में उनके खिलाफ दर्ज सीबीआई एफआईआर के आधार पर गिरफ्तार किया था।

आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता सत्येंद्र जैन ने ईडी के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। करीब चार साल पहले- 6 सितंबर, 2019 को सीबीआई के पास दर्ज मामले में ट्रायल कोर्ट ने जैन को नियमित जमानत दे दी थी।

जम्मू में नया उच्च न्यायालय परिसर निर्माण मामला; सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगी प्रगति रिपोर्ट

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से पूछा कि जम्मू में हाईकोर्ट के नए कैंपस के निर्माण मामले में क्या प्रगति हुई है? बता दें कि इसी साल लगभग छह महीने पहले नए उच्च न्यायालय परिसर की आधारशिला रखी गई थी। बीते 28 जून को चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने जम्मू में एक नए कैंपस की नींव रखी थी। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने जम्मू और श्रीनगर में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) की पीठ में रिक्तियों और लंबित मामलों की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से सवाल पूछा। 

केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को दोनों शहरों- जम्मू और श्रीनगर में CAT की पीठों में रिक्तियों और लंबित मामलों की जानकारी दी। न्यायाधिकरण के लिए बुनियादी ढांचे के अभाव का जिक्र करते हुए भाटी ने राज्य सरकार के वकीस से जवाब मांगने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दलीलों को सुनने के बाद मामले की सुनवाई अगले साल 20 फरवरी को तय की। अदालत ने कहा, उच्च न्यायालय की जम्मू पीठ के निर्माण में क्या प्रगति हो रही है, यह जानना जरूरी है क्योंकि CAT में लंबित मामलों का पहलू भी इससे जुड़ा हुआ है।

गौरतलब है कि इस मामले में शीर्ष अदालत ने 25 सितंबर को भी आदेश पारित किया था। अदालत ने अपने आदेश में न्यायाधिकरण की दो पीठों के समक्ष 16,000 से अधिक लंबित मामलों को रेखांकित किया था। वर्तमान स्टेटस रिपोर्ट का जिक्र करते हुए पीठ ने नोट किया कि लंबित मामले मामूली रूप से कम हुए हैं। अभी भी लगभग 15,000 केस लंबित हैं।

मणिपुर जातीय हिंसा पर ट्वीट; पत्रकार पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, सुप्रीम कोर्ट ने कही यह बात

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को सुने गए एक और अहम मामले में पत्रकार को राहत दी। अदालत ने मणिपुर में जातीय हिंसा पर ट्वीट करने के मामले में इस पत्रकार के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी के संबंध में किसी भी संभावित दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, अगले आदेश तक याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर से संबंधित किसी भी कार्यवाही पर रोक रहेगी। कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किया।

महिला याचिकाकर्ता मेकपीस सितलहो (Makepeace Sitlhou) की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने उन्हें आपराधिक और दंडात्मक कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान की। सिब्बल ने अदालत को बताया कि पुरस्कार विजेता स्वतंत्र पत्रकार सितल्हो के खिलाफ मणिपुर में जातीय हिंसा पर उनके ट्वीट को लेकर इंफाल में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

मणिपुर के छात्रों को यूनिवर्सिटी बदलने का मौका मिलेगा; सुप्रीम कोर्ट ने कही यह बात

जज धनंजय चंद्रचूड़ - फोटो : social media
मणिपुर के ही एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जातीय हिंसा प्रभावित मणिपुर के 284 छात्रों को राहत दी। शीर्ष अदालत ने छात्रों को मणिपुर विश्वविद्यालय की ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेने की अनुमति दी। इसके अलावा सिलचर में असम विश्वविद्यालय या शिलांग में नॉर्थ ईस्ट हिल यूनिवर्सिटी में तबादले का विकल्प भी दिया गया। शीर्ष अदालत मणिपुर यूनिवर्सिटी ईआईएमआई वेलफेयर सोसाइटी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। 284 छात्रों की ओर से दायर याचिका पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, मणिपुर विश्वविद्यालय की तरफ से नियुक्त नोडल अधिकारी का नाम यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर पोस्ट किया जाए। अधिकारी को आवेदन करने के दो सप्ताह के भीतर इच्छुक छात्रों का तबादला सुनिश्चित करना होगा।

बता दें कि जातीय हिंसा से प्रभावित मणिपुर के अलग-अलग इलाकों में रहने वाले 284 छात्र वर्तमान में देश भर के अलग-अलग जगहों पर रह रहे हैं। इन्होंने अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों में स्थानांतरण की अपील की है। छात्रों की दलील है कि राज्य में हिंसा के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन विकल्प दिए। इसमें पहला विकल्प मणिपुर विश्वविद्यालय में ऑनलाइन क्लास, जबकि दूसरा और तीसरा यूनिवर्सिटी बदलने का है।

सुप्रीम कोर्ट में सेना का जवाब; महिला अधिकारियों के करियर से जुड़ी नीति पर मंथन जारी

टेरिटोरियल आर्मी - फोटो : Social Media
साढ़े तीन साल से अधिक समय पहले पारित एक आदेश के संबंध में भारतीय सेना ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में जवाब दिया। सेना ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष कहा, भारतीय सेना में महिला अधिकारियों के करियर और उनकी प्रगति से जुड़ी नीतियों पर मंथन जारी है। सेना ने बताया कि सेना में प्रमोशन से जुड़े सवाल, कर्नल से ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति जैसे मुद्दों पर एक नीति बनाने पर विचार-विमर्श चल रहा है। .

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और वरिष्ठ अधिवक्ता आर बालासुब्रमण्यम की दलीलें सुनने के बाद कहा, नीति तैयार करने के लिए सेना के पास 31 मार्च, 2024 तक का समय है। अदालत ने याचिका अप्रैल, 2024 के पहले सप्ताह में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। दरअसल, कुछ महिला सैन्य अधिकारियों ने कर्नल से ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति में भेदभाव का आरोप लगाया है।

गौरतलब है कि 17 फरवरी, 2020 को पारित ऐतिहासिक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि सेना में महिला अधिकारियों के लिए स्थायी कमीशन का प्रावधान होना चाहिए। अदालत ने "महिलाओं की शारीरिक सीमाओं" को लेकर केंद्र सरकार का रुख खारिज कर दिया था। अदालत ने केंद्र की दलीलों को "सेक्स रूढ़िवादिता" पर आधारित माना और स्थायी कमीशन न होने को "महिलाओं के खिलाफ लैंगिक भेदभाव" करार दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा में लौह अयस्क खनन को सीमित करने की संभावनाओं पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से सवाल में शीर्ष अदालत ने पूछा कि क्या ओडिशा में सीमित लौह अयस्क भंडार को ध्यान में रखते हुए खनन पर कोई सीमा लगाई जा सकती है? पर्यावरण मंत्रालय से चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सवाल किया। तीन जजों की पीठ ने कहा, शीर्ष अदालत पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का दृष्टिकोण जानना चाहती है। पीठ ने गैर सरकारी संगठन (NGO)- कॉमन कॉज की याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से सवाल पूछा।

याचिकाकर्ता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश वकील ने कहा कि खनन की वर्तमान गति को ध्यान में रखते हुए लौह अयस्क 25 वर्षों में समाप्त हो जाएगा। ऐसे में खनन पर अंकुश लगाने की जरूरत है। सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ओडिशा सरकार को चार सप्ताह में एक नया हलफनामा दायर करने का भी निर्देश दिया। पिछली सुनवाई में ओडिशा सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने 14 अगस्त को कहा था कि राज्य सरकार ने डिफॉल्टर खनन कंपनियों से जुर्माने के तौर पर बड़ी रकम वसूली है। हालांकि, अभी 2,622 करोड़ रुपये की वसूली बाकी है। उन्होंने शीर्ष अदालत को बताया था कि पांच पट्टेदार खनन फर्मों से लगभग 2,215 करोड़ रुपये मुआवजा वसूलना था। उन्होंने भरोसा दिलाया था कि सरकार बकाया की शीघ्र वसूली करने के लिए कदम उठाएगी।

हिंसा पर ट्वीट करने वाले पत्रकार को दी दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मणिपुर में जातीय हिंसा पर ट्वीट के लिए एक पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर के संबंध में किसी भी संभावित दंडात्मक कार्रवाई से उसे सुरक्षा प्रदान की। पीठ ने मेकपीस सितल्हो की ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल की दलीलों पर ध्यान दिया और उन्हें आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान की।  
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राहुल गांधी की सदस्यता बहाली को चुनौती पर सुनवाई टली
सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता बहाल करने के आदेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई टाल दी। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने मामले को स्थगित करने की मांग करने वाले एक पत्र के मद्देनजर सुनवाई स्थगित की। आदेश को चुनौती देने वाली याचिका लखनऊ के वकील अशोक पांडेय ने दायर की। याचिका में कहा गया है कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(3) और अनुच्छेद 102 और 191 के तहत एक बार अगर कोई संसद की सदस्यता खो देता है तो बिना आरोपों से बरी हुए उसकी संसद सदस्यता बहाल नहीं हो सकती है।  
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